Podcasts by Category
This podcast presents Hindi poetry, Ghazals, songs, and Bhajans written by me. इस पॉडकास्ट के माध्यम से मैं स्वरचित कवितायेँ, ग़ज़ल, गीत, भजन इत्यादि प्रस्तुत कर रहा हूँ Awards StoryMirror - Narrator of the year 2022, Author of the month (seven times during 2021-22) Kalam Ke Jadugar - Three Times Poet of the Month. Sometimes I also collaborate with other musicians & singers to bring fresh content to my listeners. Always looking for fresh voices. Write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com #Hindi #Poetry #Shayri #Kavita #HindiPoetry #Ghazal
- 101 - महाशिवरात्रि (Mahashivratri)
अलौकिक पर्व है आया, ख़ुशी हर ओर छाई है।
महादेवी सदाशिव के, मिलन की रात आई है॥
धवल तन नील ग्रीवा में, भुजंगों की पड़ी माला।
सुसज्जित सोम मस्तक पर, जटा गंगा समाई है॥
सवारी बैल नंदी की, चढ़ी बारात भूतों की।
वहीँ गन्धर्व यक्षों ने, मधुर वीणा बजाई है॥
पुरोहित आज ब्रह्मा हैं, बड़े भ्राता हैं नारायण।
हिमावन तात माँ मैना, को जोड़ी खूब भाई है॥
अटारी चढ़ निहारे हैं, भवानी चंद्रशेखर को।
मिली आँखों से जब आँखें, वधू कैसी लजाई है॥
अनूठा आज मंगल है, महाशिवरात्रि उत्सव का।
सकल संसार आनंदित, बधाई है बधाई है॥
जगत कल्याण करने को, सदा तत्पर मेरे भोले।
हलाहल विष पिया हँस कर, धरा सारी बचाई है॥
नमन श्रद्धा सहित मेरा, करो स्वीकार चरणों में।
समर्पित शक्ति-औ-शिव को, ग़ज़ल ‘अवि’ ने बनाई है॥
-----------------
Lyrics - Vivek Agarwal Avi
Music & Vocal - Suno AI
You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Wed, 26 Feb 2025 - 05min - 100 - पवित्र पुण्य भारती (Pavitra Punya Bharti)
पवित्र पुण्य भारती (पञ्चचामर छंद)
भले अनेक धर्म हों, परन्तु एक धाम है।
पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥
समान सर्व प्राण हैं, विधान संविधान है।
महान लोकतंत्र है, स्वतंत्रता महान है।
तिरंग हाथ में उठा, कि आन बान शान है।
कि कोटि कंठ गूंजता, सुभाष राष्ट्र गान है।
ललाट गर्व से उठा, न शीश ये कभी झुका।
सदैव साथ देश का, स्वदेश भक्ति काम है॥
पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥
अनेक पुष्प हैं लगे, परन्तु एक हार है।
अनेक ग्रन्थ हैं यहाँ, हितोपदेश सार है।
अनेक हाथ जो मिले, प्रचंड मुष्टि वार है।
समक्ष शत्रु जो मिले, लहू सनी कटार है।
अदम्य वीर साहसी, सपूत मात के वही।
कि काट शीश जो धरे, वही रहीम राम है॥
पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥
दिपावली कि ईद हो, नमाज़ हो कि आरती।
विभिन्न पंथ पर्व से, वसुंधरा सँवारती।
अनेक भिन्न बोलियाँ, सुपुत्र को पुकारती।
निनाद नृत्य गान से, प्रसन्न भव्य भारती।
नई उड़ान है यहाँ, नया यहाँ प्रभात है।
ममत्व मातृ अंक में, मिला मुझे विराम है॥
पवित्र पुण्य भारती, प्रणाम है प्रणाम है॥
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
You can write to me on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Fri, 24 Jan 2025 - 03min - 99 - सुभाष चंद्र बोस ( Subhash Chandra Bose)
कथा सुनो सुभाष की, अदम्य स्वाभिमान की।
अज़ाद हिन्द फ़ौज के, पराक्रमी जवान की॥
अनन्य राष्ट्र प्रेम की, अतुल्य शौर्य त्याग की।
सहस्त्र लक्ष वक्ष में, प्रचंड दग्ध आग की॥
सशस्त्र युद्ध राह पे, सदैव वो रहा डटा।
समस्त विश्व साक्ष्य है, नहीं डरा नहीं हटा॥
असंख्य शत्रु देख के, गिरा न स्वेद भाल से।
अभीष्ट लक्ष्य के लिए, लड़ा कराल काल से॥
अतीव कष्ट मार्ग में, सुपुत्र वो नहीं रुका।
न लोभ मोह में फँसा, न शीश भी कभी झुका॥
स्वतंत्र राष्ट्र स्वप्न को, समस्त देश को दिखा।
कटार धार रक्त से, नवीन भाग्य भी लिखा॥
अभूतपूर्व शौर्य का, वृत्तांत विश्व ये कहे।
सुकीर्ति सपूत की, सुगंध सी बनी रहे॥
समान सूर्य चंद्र के, अमर्त्य दीप्त नाम है।
सुभाष चंद्र बोस को, प्रणाम है प्रणाम है॥
_____________________
Lyrics - Vivek Agarwal Avi
Music & Vocal - SunoAI
Wed, 22 Jan 2025 - 04min - 98 - Shri Ram Chandra Stuti
रघुपुङ्गव राघवेंद्र रामचन्द्र राजा राम।
सर्वदेवादिदेव सबसे सुन्दर यह नाम।
शरणत्राणतत्पर सुन लो विनती हमारी।
हरकोदण्डखण्डन खरध्वंसी धनुषधारी।
दशरथपुत्र कौसलेय जानकीवल्लभ।
विश्वव्याप्त प्रभु आपका कीर्ति सौरभ।
विराधवधपण्डित विभीषणपरित्राता।
भवरोगस्य भेषजम् शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता।
सप्ततालप्रभेत्ता सत्यवाचे सत्यविक्रम।
आदिपुरुष अद्वितीय अनन्त पराक्रम।
रघुपुङ्गव राघवेंद्र रामचन्द्र राजा राम।
सर्वदेवादिदेव सबसे सुन्दर यह नाम।
महादेवादिपूजित मायामारीचहन्ता।
दीनानाथ दयासार दान्त दुःखहन्ता।
परंज्योति पराकाश परात्पर परंधाम।
सुमित्रापुत्रसेवित सर्वदेवात्मक श्रीराम।
आजानुबाहु आप अहल्याशापशमन।
जयन्तत्राणवरद के चरणों में है नमन।
महाबाहो महायोगी पुण्डरीकलोचन।
भक्तवत्सल प्रभु कीजिये पापमोचन।
रघुपुङ्गव राघवेंद्र रामचन्द्र राजा राम।
सर्वदेवादिदेव सबसे सुन्दर यह नाम।
___________________
Lyrics, Prompt Engineering, Production - Vivek Agarwal Avi
Vocal - Suno AI
Thu, 05 Sep 2024 - 04min - 97 - श्री राम नवमी (Shri Ram Navmi)
श्री राम नवमी - (हरिगीतिका छंद)
श्री राम नवमी पर्व पावन, राम मंदिर में मना।
संसार पूरा राममय है, राम से सब कुछ बना॥
संतों महंतों की हुई है, सत्य सार्थक साधना।
स्त्री-पुरुष बच्चे-बड़े सब, मिल करें आराधना॥
नीरज नयन कोदंड कर शर, सूर्य का टीका लगा।
मस्तक मुकुट स्वर्णिम सुशोभित, भाग्य भारत का जगा॥
आदर्श का आधार हो तुम, धैर्य का तुम श्रोत हो।
चिर काल तक जलती रहेगी, धर्म की वह ज्योत हो॥
तन मन वचन सब कुछ समर्पित, जाप हर पल नाम का।
अब राम ही अपना सहारा, आसरा बस राम का॥
श्रद्धा सहित समर्पित
सुर - डॉ सुभाष रस्तोगी
गीतकार - विवेक अग्रवाल "अवि"
मूल संगीत - उषा मंगेशकर
संयोजन - अमोल माटेगांवकर
Write to us on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Sun, 12 May 2024 - 06min - 96 - ग़ज़ल - मधुमास (Ghazal - Madhumas)
समापन है शिशिर का अब, मधुर मधुमास आया है।
सभी आनंद में डूबे, अपरिमित हर्ष छाया है॥
सुनहरे सूत को लेकर, बुना किरणों ने जो कम्बल।
ठिठुरते चाँद तारों को, दिवाकर ने उढ़ाया है॥
...
...
समर्पित काव्य चरणों में, बनाई छंद की माला।
नमन है वागदेवी को, सुमन ‘अवि’ ने चढ़ाया है॥
गीतकार - विवेक अग्रवाल "अवि"
स्वर - श्रेय तिवारी
---------------
Full Ghazal is available for listening
You can write to me on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Fri, 08 Mar 2024 - 04min - 94 - प्रतिशोध (Revenge)
मेरी यह कविता "प्रतिशोध" पुलवामा के वीर बलिदानियों और भारतीय वायु सेना के पराक्रमी योद्धाओं को समर्पित है चलो फिर याद करते हैं कहानी उन जवानों की। बने आँसू के दरिया जो, लहू के उन निशानों की॥ .. .. .. नमन चालीस वीरों को, यही संकल्प अपना है। बचे कोई न आतंकी, यही हम सब का सपना है॥ The full Poem is available for your listening. You can write to me on HindiPoemsByVivek@gmail.com
Tue, 13 Feb 2024 - 04min - 93 - बड़ी ख़ूबसूरत (Badi Khoobsoorat)
बड़ी ख़ूबसूरत शिकायत है तुझको कि ख़्वाबों में अक्सर बुलाया है हम ने बड़ी आरज़ू थी हमें वस्ल की पर जुदाई को हमदम बनाया है हमने तेरा अक्स आँखों में हमने छिपाया तभी तो न आँसू भी हमने बहाए तेरा नूर दिल में अभी तक है रोशन 'अक़ीदत से तुझको इबादत बनाकर लबों पर ग़ज़ल सा सजाया है हमने भुलाना तो चाहा भुला हम न पाए तेरी याद हर पल सताती है हमको नहीं आज कल की है तुझसे मोहब्बत बड़ी मुद्दतों से बड़ी शिद्दतों से बड़ा टूट कर दिल लगाया है हम ने सबब आशिक़ी का भला क्या बतायें ये दिल की लगी है तो बस दिल ही जाने न सोचा न समझा मोहब्बत से पहले सुकूं चैन अपना मेरी जान सब कुछ तेरी जुस्तुजू में गँवाया है हमने Lyrics - Vivek Agarwal Music and Vocals - Ranu Jain Write to us at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Sun, 31 Dec 2023 - 05min - 92 - नज़्म - वर्चुअल वर्ल्ड (Nazm-Virtual World)
किताबें छोड़ फोनों को, नया रहबर बनाया है। तिलिस्मी जाल में फँस कर सभी कुछ तो भुलाया है। उसी के साथ गुजरे दिन, उसी के साथ सोना है। समंदर वर्चुअल चाहे, असल जीवन डुबोना है। ट्विटर टिकटौक गूगल हों, या फिर हो फेसबुक टिंडर। हैं उपयोगी सभी लेकिन, अगर लत हो बुरा चक्कर। भुला नज़दीक के रिश्ते, कहीं ढूँढे हैं सपनों को। इमोजी भेज गैरों को, करें इग्नोर अपनों को। ये मेटावर्स की दुनिया, हज़ारों रंग भरती है। भले नकली चमक लेकिन, बड़ी असली सी लगती है। न खाते वक़्त पर खाना, न सोते हैं समय से अब। नहीं अच्छी रहे सेहत, पड़े बिस्तर पे रहते जब। हमारे देश का फ्यूचर, ज़रा सोचो तो क्या होगा। युवा अपना जो तन-मन से, अगर मज़बूत ना होगा। कभी सच्ची कभी झूठी, ख़बर तेजी से बढ़ती हैं। बिना सर पैर अफ़वाहें, करोड़ों घर पहुँचती हैं। बिना जाँचे बिना परखे, यकीं हर चीज पर मत कर। बँटे है ज्ञान अधकचरा, ये कूड़ा मत मग़ज़ में भर। समझ ले बात अच्छे से, किताबें काम आएँगी। दिमागों में भरा सारा, जहर बाहर निकालेंगी। You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Fri, 22 Dec 2023 - 05min - 91 - तुम को देखा (Tum Ko Dekha)
तुम को देखा तो ये ख़याल आया।
प्यार पाकर तेरा है रब पाया।
झील जैसी तेरी ये आँखें हैं।
रात-रानी सी महकी साँसें हैं।
झाँकती हो हटा के जब चिलमन,
जाम जैसे ज़रा सा छलकाया।
तुम को देखा ……
देखने दे मुझे नज़र भर के।
जी रहा हूँ अभी मैं मर मर के।
इस कड़ी धूप में मुझे दे दे,
बादलों जैसी ज़ुल्फ़ की छाया।
तुम को देखा ……
ज़िंदगी भर थी आरज़ू तेरी।
तू ही चाहत तू ज़िंदगी मेरी।
पास आकर भी दूर क्यूँ बैठे,
चाँद सा चेहरा क्यूँ है शरमाया।
तुम को देखा ……
तुम को देखा तो ये ख़याल आया।
प्यार पाकर तेरा है रब पाया।
You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Thu, 14 Dec 2023 - 02min - 90 - इश्क़ दोबारा (Love Again)
एक किताब सा मैं जिसमें तू कविता सी समाई है,
कुछ ऐसे ज्यूँ जिस्म में रुह रहा करती है।
मेरी जीस्त के पन्ने पन्ने में तेरी ही रानाई है,
कुछ ऐसे ज्यूँ रगों में ख़ून की धारा बहा करती है।
एक मर्तबा पहले भी तूने थी ये किताब सजाई,
लिखकर अपनी उल्फत की खूबसूरत नज़्म।
नीश-ए-फ़िराक़ से घायल हुआ मेरा जिस्मोजां,
तेरे तग़ाफ़ुल से जब उजड़ी थी ज़िंदगी की बज़्म।
सूखी नहीं है अभी सुर्ख़ स्याही से लिखी ये इबारतें,
कहीं फ़िर से मौसम-ए-बाराँ में धुल के बह ना जायें।
ए'तिमाद-ए-हम-क़दमी की छतरी को थामे रखना,
शक-ओ-शुबह के छींटे तक इस बार पड़ ना पायें।
Write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Sun, 01 Oct 2023 - 02min - 86 - आज़ादी के मायने (Azadi Ke Mayne)Wed, 02 Aug 2023 - 05min
- 85 - ग़ज़ल - न सुकून है (Ghazal - Na Sukun Hai)
न सुकून है न ही चैन है; न ही नींद है न आराम है।
मेरी सुब्ह भी है थकी हुई; मेरी कसमसाती सी शाम है।
न ही मंज़िलें हैं निगाह में; न मक़ाम पड़ते हैं राह में,
ये कदम तो मेरे ही बढ़ रहे; कहीं और मेरी लगाम है।
कि बड़ी बुरी है वो नौकरी; जो ख़ुदी को ख़ुद से ही छीन ले,
यहाँ पिस रहा है वो आदमी; जो बना किसी का ग़ुलाम है।
---
---
शाइर - विवेक अग्रवाल 'अवि'
आवाज़ - नरेश नरूला
Fri, 16 Jun 2023 - 06min - 84 - ग़ज़ल- कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
साहिर उस दौर के शायर थे जब शायरी ग़म-ए-जानाँ तक न सिमट ग़म-ए-दौराँ की बात करने लगी थी। इस ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है जो न सिर्फ खुद के गम पर हालात के गम का ज़किर भी करता है। आज इसी ग़ज़ल में कुछ और अशआर जोड़ने की हिमाकत की है। मुलाइज़ा फरमाइयेगा।
Sat, 06 May 2023 - 03min - 83 - ग़ज़ल - न तू ग़लत न मैं ग़लत (Ghazal - Na Tu Galat Na Mein Galat)
तू आग थी मैं आब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
तू ज़िन्दगी मैं ख़्वाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
उधर भी आग थी लगी इधर भी जोश था चढ़ा,
नया नया शबाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
जो सुर्ख़ प्यार का निशाँ तिरी निगाह में रोज था,
मिरे लिये गुलाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
ख़मोश लब तिरे रहे हमेशा उस सवाल पर,
वही तिरा जवाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
ख़ुशी व ग़म का बाँटना मिरे लिए वो प्यार था,
तिरे लिए हिसाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
दिलों में गाँठ क्यूँ पड़ी ये आज तक नहीं पता,
वो वक़्त ही ख़राब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
अलग अलग है रास्ता अलग अलग हैं मंज़िलें,
कोई न हम-रिकाब था न तू ग़लत न मैं ग़लत।
शाइर - विवेक अग्रवाल 'अवि'
सुर और संगीत - रणधीर सिंह
Wed, 03 May 2023 - 04min - 82 - बस समय है प्यार का
ये जिंदगी का मोड़ वो, कि बस समय है प्यार का।
सवाल ना जवाब ना, न वक़्त इंतिज़ार का।
क्यों छोड़ कर चले गए, ये आज तक नहीं पता।
मिली मुझे बड़ी सजा, मेरी भला थी क्या ख़ता।
कि आज भी जिगर में है, वो अक्स मेरे यार का।
ये जिंदगी का मोड़ वो, कि बस समय है प्यार का।
मिले थे आखिरी दफा, न कुछ सुना न कुछ कहा।
नजर से बस नजर मिला, न अश्क़ भी कहीं बहा।
न देख तू यहाँ वहाँ, ये वक़्त है इज़्हार का।
ये जिंदगी का मोड़ वो, कि बस समय है प्यार का।
लबों पे रख चला गया, निदा तेरे ही नाम की।
उसेक पल में पी गया, शराब लाख जाम की।
कि आज तक चढ़ा हुआ, नशा उसी ख़ुमार का।
ये जिंदगी का मोड़ वो, कि बस समय है प्यार का।
पता नहीं मुझे तेरे, मिज़ाज का ख़िसाल का।
नसीब में है क्या लिखा, तेरे मेरे विसाल का।
नहीं ख़याल है मुझे, उसूल का वक़ार का।
ये जिंदगी का मोड़ वो, कि बस समय है प्यार का।
ये जिंदगी का मोड़ वो, कि बस समय है प्यार का।
सवाल ना जवाब ना, न वक़्त इंतिज़ार का।
Wed, 12 Apr 2023 - 05min - 81 - सच्ची स्वतंत्रता (Real Freedom)
सब कहते हैं हम अब स्वतंत्र हैं
पर सच कहूँ तो लगता नहीं
निज भाषा का तिरस्कार देखता हूँ
स्वदेशी पोशाकों को होटल, क्लब से
निष्काषित होते देखता हूँ
सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी में
मी लार्ड को टाई न पहनने के ऊपर
फटकार लगाते देखता हूँ
Full Poem is available for listening
You may write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Thu, 30 Mar 2023 - 04min - 80 - प्रकृति का पाठ (Lessons from Nature)Sat, 25 Mar 2023 - 02min
- 79 - एक पाती कविता के नाम (A letter to my Poem)Mon, 20 Mar 2023 - 03min
- 78 - ग़ज़ल - सफलता (Ghazal - Success)
नहीं घबरा के तुम हटना ये मंज़िल मिल ही जाएगी।
डटे रहना निरंतर तुम सफलता हाथ आएगी।
परीक्षाएं बहुत होती हैं दृढ़ निश्चय परखने को,
लगन सच्ची लगी तुमको तो मेहनत रंग लाएगी।
...
...
अगर हँसता ज़माना है तो चिंता तुम नहीं करना,
अभी हँसती है जो दुनिया वही सर पर बिठाएगी।
विवेक अग्रवाल 'अवि'
Full Ghazal is available for listening
You may write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Fri, 03 Mar 2023 - 05min - 77 - ग़ज़ल – पैसा (Ghazal - Paisa)
कड़ी मेहनत बड़ी मुद्दत लगे पैसा कमाने में।
नहीं लगता ज़रा सा वक़्त पैसे को गँवाने में।
बड़ा आसान है कहना कि पैसा ही नहीं सब कुछ,
बिना पैसे नहीं मिलता यहाँ कुछ भी ज़माने में।
---
---
बड़ी ताकत है पैसे में सभी पर ये पड़े भारी,
अदालत में चले पैसा यही चलता है थाने में।
अमीरी के सभी साथी गरीबी बस अकेली है,
भरी जेबें ज़रूरी है सभी रिश्ते निभाने में।
Full Ghazal is available for listening
You may write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Sat, 11 Feb 2023 - 05min - 76 - विक्रमादित्य के नवरत्न (Nine Jewels of Vikramaditya)
आज सुनाता कथा पुरानी, जब सोने की चिड़िया भारत था।
सुख समृद्धि से सज्जित, स्वर्ण-भूमि में सबका स्वागत था।
अमरावती से सुन्दर नगरी, जहाँ महाकाल का धाम था।
समस्त विश्व का केंद्र थी, उज्जयिनी जिसका नाम था।
इंद्र से भी वैभवशाली, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य सम्राट थे।
चहुँ ओर फैला था कीर्ति सौरभ, गौरव से उन्नत ललाट थे।
स्वर्ण रजत मोती माणिक, धन धान्य से भरे थे राजकोष।
पर वो अनमोल रतन कौन थे, जो देते सच्चा परितोष।
जौहरी राजन को पहचान थी, की धन से बड़ा है ज्ञान।
सभा में उनकी नवरत्न थे, सब एक से बढ़ एक महान।
महाराज विक्रमादित्य के नव रत्नों के गुणों के बारे में जानने के लिए यह कविता अवश्य सुनें
To know about the specialties of each of the nine jewels, listen to this poem.
You can write to us at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Sat, 28 Jan 2023 - 05min - 75 - ग़ज़ल - बस क़िस्से और कहानी में (Ghazal - Bas Kisse Aur Kahani Mein)
ग़ज़ल - घर में सजते चाँद सितारे, बस क़िस्से और कहानी में
घर में सजते चाँद सितारे, बस क़िस्से और कहानी में।
सोने चाँदी के गुब्बारे, बस क़िस्से और कहानी में।
रोज़ बिखरते ख़्वाब यहाँ पर, टूटे दिल भी हमने देखे,
सच होते हैं सपने सारे, बस क़िस्से और कहानी में।
नफ़रत झूठ फ़रेब दिखा है, इस ज़ालिम दुनिया में अपनी,
सभी लोग सच्चे और प्यारे, बस क़िस्से और कहानी में।
ज़ुल्म सितम दहशत है फैली, नेकी कोने में बैठी है,
जीते अच्छा बुरा ही हारे, बस क़िस्से और कहानी में।
शुक्रगुज़ारी भूल गए सब, ख़ुद-ग़रज़ी फ़ितरत है सबकी,
अपने सारे क़र्ज़ उतारे, बस क़िस्से और कहानी में।
- विवेक अग्रवाल 'अवि'
(बहर-ए-मीर)
Write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Fri, 20 Jan 2023 - 04min - 74 - VIDEO VERSION - बातें दिल कीSun, 15 Jan 2023 - 03min
- 73 - हिंदी (Hindi)
बड़ी पुत्री है संस्कृत की सरल भाषा तथा बोली।
निरंतर सीखती रहती सभी से बन के हमजोली॥
अनेकों रूप लेकर भी बड़ी मीठी है अलबेली।
भले अवधी या ब्रजभाषा खड़ी बोली या बुन्देली॥
ये जयशंकर महादेवी निराला जी की कविता है।
मधुर मोहक सरस सुन्दर चपल चंचल सी सरिता है॥
..
..
हमें सर्वोच्च दुनिया में अगर भारत बनाना है।
तो सोतों को जगाना है व हिंदी को बढ़ाना है॥
चलो हिंदी दिवस पर सब प्रतिज्ञा आज करते हैं।
कि भारत देश उपवन में छटा हिंदी की भरते हैं॥
Full Poem is available for listening
You may write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
#Hindi #HindiDiwas #WorldHindiDay #VishvHindiDiwas
Mon, 09 Jan 2023 - 05min - 71 - परिवार का चूल्हा (Pariwar Ka Chulha)
परिवार का चूल्हा परिवार का चूल्हा, मात्र प्रेम की अग्नि से नहीं चलता, ईंधन भी माँगता है। कर्तव्य की लकड़ियाँ आवश्यक हैं, चूल्हे के जलते रहने के लिए। कभी कभी त्याग का घी-तेल, भी डालना होता है, और व्यवहारिकता की फुँकनी से, समझौते की हवा भी फूँकनी होती है। असुविधाओं का धुँआ सहन करते हुए। Full poem is available for listening Write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Thu, 05 Jan 2023 - 04min - 70 - ब्रह्म-ज्ञान (Brahm-Gyaan)
इस कविता में आत्मा के अजर अमर स्वरुप का वर्णन कर उसका अंतिम लक्ष्य ब्रह्म प्राप्ति बता कर उसके तीन अलग अलग मार्गों की परिचर्चा की गयी है। यही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है और यही सबसे बड़ा ज्ञान है। इसीलिए इसे ब्रह्मज्ञान भी कहा गया है
आओ चलो एक गहरा राज तुम सबको बतलाता हूँ।
जीवन का ये सत्य शाश्वत आज तुम्हें समझाता हूँ।
पञ्च तत्व से बनी ये काया तन अपना ये नश्वर है।
तो क्यूँ इससे मोह करें जब क्षणभंगुर ये नाता है।
Full Poem in Audio Format ....
Write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Fri, 30 Dec 2022 - 06min - 69 - समर्पण (Samarpann)
मुझे मोक्ष मत देना मोहन,
मत करना मुक्ति मार्ग प्रशस्त।
संध्या की जब बेला आये,
और हो जीवन का सूर्य अस्त॥
नहीं कामना वैकुण्ठ की मुझको,
न चाहूँ इंद्र का सिंहासन।
सम्पूर्ण सृष्टि में नहीं बना कुछ,
मेरी भारत भूमि सा पावन॥
श्वेत किरीट शोभित मस्तक पर,
करे पयोधि पद-प्रक्षालन।
सप्तसिंधु से सिंचित ये भूमि,
सर्वोच्च सदा से रही सनातन॥
इस पुण्य भूमि में क्रीड़ा करने,
ईश्वर स्वयं मनुज बन आते।
सौभाग्य यहाँ आने का पाकर,
यक्ष देव किन्नर इठलाते॥
बार बार लूँ जन्म यहीं पर,
बार बार यहीं मर-मिट जाऊँ।
समिधा बन इस पवित्र यज्ञ में,
हर जीवन सार्थक कर पाऊँ॥
मुझे लोभ नहीं मुझे मोह नहीं,
ये भक्ति और समर्पण है।
मातृभूमि के पावन चरणों में,
अपना सब कुछ अर्पण है॥
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
Thu, 22 Dec 2022 - 02min - 68 - मेरे अल्फ़ाज़ और मित्रों की आवाज़ (My words & Friends' voice)Sat, 10 Dec 2022 - 05min
- 67 - ग़ज़ल - वो जो ज़िन्दगी थी मेरी कभी (Ghazal - Wo Jo Zindagi Thi Meri Kabhi)
वो जो ज़िन्दगी थी मेरी कभी; वो जो पहला पहला ख़ुमार था।
मुझे ज़िन्दगी में नहीं मिला; मेरी ज़िन्दगी का जो प्यार था।
ये जो अश्क़ अपने ही पी रहा; ये जो क़िस्त क़िस्त में जी रहा,
मैं चुका रहा हूँ वो आज भी; जो तेरा पुराना उधार था।
मेरी ज़िन्दगी का उसूल है; जो तुझे ख़ुशी दे क़ुबूल है,
क्यूँ शिकायतें मेरे दिल में हों; न कभी भी कोई क़रार था।
जो नसीब में है लिखा नहीं; मुझे ख्वाब कोई दिखा नहीं,
मैं अभी भी चैन से जी रहा; मैं तभी भी शुक्र-गुज़ार था।
मेरी ज़ीस्त में जो ख़ुशी दिखी; वो भी नाम तेरे ही कर लिखी,
तू भी ग़म तेरे मुझे दे ज़रा; मैं हिसाब में हुशियार था।
--------------
Lyrics - Vivek Agarwal 'Avi'
Music and Vocals - Ranu Jain
Thu, 08 Dec 2022 - 06min - 66 - ट्रिक और ट्रीट? (Trick or Treat)
ट्रिक और ट्रीट?
मैं मूक स्तब्ध दरवाजे पर खड़ा था,
सामने बच्चों का एक झुण्ड अड़ा था।
कोई भूत कोई चुड़ैल कोई सुपर हीरो बना हुआ,
पूरे आत्मविश्वास के साथ द्वार पर तना हुआ।
एक एक कर मैंने सबके चेहरों को निहारा,
कोई पापा की परी कोई माँ का राजदुलारा।
कोई ड्रैकुला बना लाल दाँत दिखा रहा था,
तो कोई हैरीपॉटर बन स्पेल्स सिखा रहा था।
ऊँचा नुकीला हैट पहने एक कन्या विच बनी थी,
और इलास्टी गर्ल की आयरन मैन से ठनी थी।
ट्रिक और ट्रीट?
मुझे मूक निष्क्रिय देख बच्चों ने फ़िर दोहराया,
और जोरों से हाथ में थामे डब्बे को खनकाया।
मैं भी अपनी सम्मोहनावस्था से बाहर आया,
और सब बच्चों को देख थोड़ा मुस्कुराया।
अरे ये सब क्या है, क्या सोसाइटी में कोई आयोजन है,
और क्या इस फैंसी ड्रेस कम्पटीशन के बाद भोजन है?
मुझे मूढ़ मति मान बच्चे मिल कर खिलखिलाये,
इट इस हैलोवीन अंकल सब साथ मुझे समझाये।
आज के दिन इसी तरह के कॉसट्युम पहनते हैं,
और घर घर जा कर कैंडी चॉकलेट इकठ्ठा करते हैं।
ट्रिक और ट्रीट?
यकायक बचपन की एक मीठी याद मन में उभर आई,
रामलीला में कितनी ही बार मैंने अंगद की भूमिका निभाई।
मुँह लाल कर गदा हाथ ले जब पाँव जोर से धरता था,
जय श्री राम के उच्च नाद से पूरा हॉल धमकता था।
गली गली हर नुक्कड़ पर सुन्दर झाँकी सजती थी,
जय गोविंदा जय गोपाला की मीठी धुन भी बजती थी।
घर घर सबसे चंदा लेने होली पर हम भी जाते थे,
हफ़्तों पहले से रंग गुलाल की आँधी खूब उड़ाते थे।
संक्रांत पर कितनी रंग बिरंगी पतंग उड़ाया करते थे,
हर तीज को आँगन के झूलों पर पींगे ऊंची भरते थे।
ट्रिक और ट्रीट?
एक बार फिर बच्चों ने किया ये उद्घोष मेरे द्वार,
क्यूँकि मुझे पुनः खींच ले गया था यादों का संसार।
सोचा कि ट्रिक बोल दूँ और देखूँ ये क्या करते हैं,
फिर सोचा कोई अच्छी ट्रीट दे सबको खुश रखते हैं।
हम तो चंदा न देनों वालों को अच्छा पाठ पढ़ाते थे,
कुछ न कुछ घर से उठा कर होली में डाल जलाते थे।
चॉकलेट का पूरा डिब्बा बच्चों के बैग में हमने डाला।
बाय बोल के सब बच्चों को बंद किया फिर घर का ताला।
मन ही मन मैं सोच रहा था कैसे उत्सव बदल गए हैं,
उमंग ढूँढ़ते अपने बच्चे कुछ नयी राहों पर निकल गए हैं।
ट्रिक और ट्रीट?
आखिर अपने समाज के लिए क्या हैं ये नए त्यौहार,
बगिया महकाते नए फूल या मूल फसल को खाती खरपतवार?
किसी भी त्यौहार पर हँसते मुस्कुराते बच्चे अच्छे लगते हैं,
पर क्या ये नए त्यौहार हमारे समाज में सच्चे लगते हैं?
त्यौहार वो कड़ी हैं जो बच्चों को स्वयं की सभ्यता से जोड़ते हैं,
उल्लास और उमंग से नवीन को पुरातन की दिशा में मोड़ते हैं।
आज त्यौहार बदलेंगे तो कल आदर्श विश्वास और मूल्य भी बदलेंगे,
और अगर मूलभूत सिद्धांत ही बदल जायेंगे तो क्या हम हम रहेंगे?
किसी दूसरे पर आक्षेप नहीं मात्र अपना सहेजने की अपेक्षा है,
क्यूँकि ये तो सच है कि आज भारत में भारत की ही उपेक्षा है।
अब आप ही निर्धारित करें कि हैलोवीन सावर है या स्वीट,
ट्रिक और ट्रीट?
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
Fri, 02 Dec 2022 - 05min - 65 - दीपदान (DeepDaan)
देवालय में बैठा बैठा मैं मन में करता ध्यान।
शुभ दिन आया मैं करूँ दीप कौन सा दान।
मिटटी के दीपक क्षणभंगुर और छोटी सी ज्योति।
बड़ी क्षीण सी रौशनी बस पल दो पल की होती।
मन में इच्छा बड़ी प्रबल दुर्लभ हो मेरा दान।
सारे व्यक्ति देख करें बस मेरा ही गुण गान।
इस नगर में हर व्यक्ति के मुख पर हो मेरा नाम।
इसी सोच में डूबा बैठा आखिर क्या करूँ मैं काम।
सोचा चाँदी की चौकी पर सोने का एक दीप सजाऊँ।
साथ में माणिक मोती माला प्रतिमा पर चढ़वाऊँ।
दीपदान के उत्सव पर क्यों ना छप्पन भोग लगाऊँ।
बाँट प्रसाद निर्धन लोगों में मन ही मन इतराऊँ।
इसी विचार में डूबा था बस बैठे बैठे आँख लगी।
एक प्रकाश सा हुआ अचानक जैसे कोई जोत जगी।
मेरे मन-मानस मंदिर में गूँज उठा एक दिव्य नाद।
सुन अलौकिक ध्वनि को मिटने लगे मेरे सभी विषाद।
स्वर्णदीप का क्या करे वो जिसने स्वर्ण-लंका ठुकराई।
चाँदी-चौकी पर वो क्या बैठे जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाई।
विश्वनाथ की क्षुधा न मांगे छप्पन भोग से सज्जित थाल।
श्रद्धा प्रेम से जो भी अर्पण भेंट वही सुन्दर विशाल।
चक्षु मेरे भी खुल गए सुन सुन्दर सार्थक सु-उपदेश।
ज्यूँ तिमिर में डूबे नभ में हो सूर्य का औचक प्रवेश।
अब सोच रहा मैं क्या दूँ ऐसा जो सबका उद्धार हो।
मेरा मन भी जो शुद्ध बने शेष न कोई विकार हो।
बहुत सोच निष्कर्ष निकाला आज दीप मैं दूँगा पाँच।
जो आज तक रखे जलाये देकर मन की घृत और आँच।
पञ्च-दीप ये अब तक मेरे मन मानस में जलते आये।
मार्गद्रष्टा बन कर मुझको निज जीवन का पथ दिखलाये।
प्रथम दीप है लोभ का जो मेरे मन में जलता है।
चाहे जितना मैं पा जाऊँ मुझको कम ही लगता है।
स्वीकार करो प्रभु प्रथम दीप मुझको अपना सेवक मान।
अब से जो भी प्राप्त करूँगा मानूँगा तेरा वरदान।
क्रोध जगत में ऐसी ज्वाला जो अपनों को अधिक जलाती है।
सबका जीवन करती दुष्कर स्वयं को भी बहुत सताती है।
क्रोध दीप है अगला जिसको आज मैं अर्पण करता हूँ।
शांत चित्त हो यही कामना मैं तुझे समर्पण करता हूँ।
अपने सुख की छोड़ कामना दूजे के सुख से जलता हूँ।
औरों का वैभव देख देख क्यों मैं दुःख में गलता हूँ।
ईर्ष्या जिस भी हृदय में रहती चैन कभी न आता है।
स्वीकार करो ये दीप तीसरा इससे न मेरा अब नाता है।
मेधा ज्ञान शक्ति वैभव आप ही हैं इस सबके दाता।
हर प्राणी इस जग में सब कुछ प्रभु आप ही से पाता।
मैं अज्ञानी अहंकार में स्वयं को समझा इनका कारण।
सौंप आज ये चौथा दीपक मैं करता निज गर्व-निवारण।
मात पिता पत्नी संतानें सम्बन्ध हमारे कितने होते।
विरह-विषाद में जीवन कटता जब हम किसी को खोते।
सबसे कठिन है तजना इसको प्रभु मुझे चाहिए शक्ति।
तज कर आज ये मोह का दीपक मैं माँगू तेरी भक्ति।
पाँच दीप मैं अर्पण करता तेरे चरणों का करके ध्यान।
कृपा करो मुझ पर तुम इतनी स्वीकार करो ये दीपदान।
अब जीवन को राह दिखलायें संतोष श्रद्धा भक्ति ज्ञान।
नव दीपक आलोकित हों मन में ऐसा मुझको दो वरदान।
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
Thu, 24 Nov 2022 - 06min - 64 - ग़ज़ल - नियामतें जो मिली (Ghazal - Niyamaten Jo Mili)
नियामतें जो मिली शुक्र सुब्ह शाम करें।
कि ख़्वाहिशों को कभी भी न बे-लगाम करें।
वो मुस्कुरा के हैं पूछे कि हाल कैसा है,
सजा के झूठ लबों पर दुआ सलाम करें।
सजा रखे थे जो अरमां लुटा दिए तुम पर,
बचे हुए हैं ये सपने कहो तमाम करें।
ख़ता नहीं थी हमारी पता नहीं तुझको,
तुझे यकीं जो दिलाये वो कैसा काम करें।
बिकी हुई है अदालत जो ठीक दो कीमत,
चलो कहीं से गवाहों का इंतिज़ाम करें।
----
सुर और संगीत - साधना रस्तोगी
शायरी - विवेक अग्रवाल 'अवि'
Write2Us at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Thu, 17 Nov 2022 - 08min - 63 - अपना भारत - एक बाल गीत (Apna Bharat - A Children Song)
भारत माता के हम बच्चे,
सबसे प्यारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
भिन्न भिन्न भोजन हैं अपने,
भिन्न भिन्न है अपनी बोली।
भिन्न भिन्न उत्सव हैं अपने,
ओणम बीहू पोंगल होली॥
भिन्न भिन्न इन त्योहारों ने,
खूब सँवारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
भारत माता के हम बच्चे,
सबसे प्यारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
भिन्न भिन्न पोशाकें अपनी,
भिन्न भिन्न हैं मौसम अपने।
भिन्न भिन्न परिवेश है अपना,
भिन्न भिन्न हैं अपने सपने॥
जब जब विपदा आन पड़ी तब,
बना सहारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
भारत माता के हम बच्चे,
सबसे प्यारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
अपना देश है प्यारी बगिया,
भिन्न भिन्न से वृक्ष सजे हैं।
भिन्न भिन्न से पक्षी चहकें,
कितने मीठे राग बजे हैं॥
भिन्न भिन्न सुन्दर फूलों ने,
खूब निखारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
भारत माता के हम बच्चे,
सबसे प्यारा अपना भारत।
दूर दूर तक देखा जग में,
सबसे न्यारा अपना भारत॥
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
विधा - १६ मात्रिक गीत
Fri, 11 Nov 2022 - 03min - 62 - रास लीला - रूपमाला छंद
प्रथम सर्ग
रास लीला की कथा को, मैं सुनाता आज।
ध्यान से सुन लो मनोहर, गूढ़ है ये राज॥
पुण्य वृन्दावन हमारा, प्रेम पावन धाम।
रात को निधि-वन पधारें, रोज श्यामा श्याम॥
दिव्य दर्शन दें प्रभु हर, पूर्णिमा की रात।
मान लो मेरा कहा ये, सत्य है यह बात॥
पेड़-पौधे पुष्प-पत्ते, झूमते मनमीत।
मोर कोयल मिल सुनाते, प्रेम रस के गीत॥
जीव-जंतु भी करे हैँ, हर्ष से गुण-गान।
तितलियाँ मदहोश होतीं, प्रेम रस कर पान॥
मुस्कुराता चाँद नभ में, चाँदनी हर ओर।
हैं सुगन्धित सब दिशायें, हर्ष का ना छोर॥
प्रेयसी राधा पुकारे, प्रेम से जब नाम।
कृष्ण को आना पड़ेगा, छोड़ सारे काम॥
कृष्ण-राधा का करें मिल, सब सखी श्रृंगार।
ज्ञान किसको चाहिए जब, प्यार ही आधार॥
पीत वस्त्रों में सुशोभित, मोर पंखी माथ।
हैं कमल से नेत्र सुन्दर, बाँसुरी है हाथ॥
सुंदरी राधा सजी हैं, लाल नीले वस्त्र।
हैं कटीले नैन उनके, शक्तिशाली शस्त्र॥
रूप अद्भुत है दमकता, स्वर्ण सा हर अंग।
रास लीला सुख उठायें, श्याम श्यामा संग॥
गीत मंगल गा रहे सब, गोप गोपी साथ।
झूम कर नाचें सभी ले, हाथ ले कर हाथ॥
पुण्य लाखों जो किये थे, तो मिली ये शाम।
गोपिका राधा लगे है, गोप में हैं श्याम॥
हैं अचंभित देवता सब, देख अध्भुत खेल।
हैं हजारों श्याम गोपी, दिव्य है यह मेल॥
रातरानी है महकती, मस्त मादक गंध।
जन्म-जन्मों तक रहेगा, आज का गठ-बंध॥
बाजती पायल छमाछम, बाजते करताल।
नृत्य करती गोपियाँ सब, नाचते गोपाल॥
रख अधर वंशी बजायी, छेड़ मीठी तान।
लोक लज्जा छोड़ राधा, नृत्य करती गान॥
रूठती राधा मनाते, कृष्ण बारम्बार।
खिलखिलाती गोपियाँ भी, देख ये मनुहार॥
हार कर भी जीत जायें, प्रेम का यह खेल।
तन भले दो एक मन पर, है अनूठा मेल॥
रात बीती भोर आयी, जागते गोपाल।
रात भर क्रीड़ा चली है, नैन लगते लाल॥
रास लीला की कहानी, रूपमाला छंद।
सुन रहे सब मुग्ध-मोहित, छा गया आनंद॥
द्वितीय सर्ग
गौर से सोचो नहीं ये, रास लीला मात्र।
रास है संसार सारा, हम सभी हैं पात्र॥
बन वियोगी राह देखें, कब मिलन का योग।
भूख दर्शन की हृदय में, प्रेम का यह रोग॥
हम अभी बिछड़े हुए हैं, दूर हमसे श्याम।
बात मेरी मान लो तुम, बस करो यह काम॥
है बड़ा भगवान से भी, दिव्य उनका नाम।
नाम जप लो नित्य उनका, आ मिलेंगे श्याम॥
मोह-माया जग है सारा, मात्र सच्चा नाम।
नाम उसका जो पुकारा, सिद्ध सारे काम॥
राम कह लो या कहो तुम, कृष्ण उसका नाम।
तुम मधूसूदन पुकारो, या कहो घनश्याम॥
देवकी नंदन वही तो, है यशोदा लाल।
नाम माखनचोर भी है, और है गोपाल॥
कंस हन्ता भी वही है, नंदलाला श्याम।
वासुदेवा कृष्ण पावन, दिव्य सारे नाम॥
नाम गज ने जब पुकारा, आ गए भगवान।
नाम मन में तू बसा ले, कर हरी का ध्यान॥
कल्पना से मात्र जिसने, है रचा संसार।
है जगत स्वामी वही है, सर्व पालनहार॥
मंझधारा में पड़े हम, वो कराता पार।
बस वही सर्वोच्च शाश्वत, सत्य का आधार॥
याद गीता पाठ हो तो, कर्म पर दो ध्यान।
सुख मिले या दुख मिले है, जिंदगी आसान॥
कर समर्पित बस उसी को, हम करें हर कर्म।
ना निराशा दम्भ हो तब, ज्ञान गीता मर्म॥
हम रहें निष्काम तो फिर, द्वेष ना अनुराग।
वाहवाही ना कमायी, ना कमाया दाग॥
जब सभी उसका जगत में, गर्व की क्या बात।
हर समय बस ध्यान उसका, भोर हो या रात॥
मन-वचन-धन-तन हमारा, सब समर्पित आज।
भक्तवत्सल आप रखना, अब हमारी लाज॥
मार्गदर्शन आपका बस, हो हमारे साथ।
जब कभी जाएँ भटक तो, थाम लेना हाथ॥
मन बसे बांके बिहारी, श्वास में बस श्याम।
और कुछ ना चाहिए अब, मिल गया विश्राम॥
जानता कुछ भी नहीं मैं, मैं नहीं विद्वान।
हूँ पड़ा चरणों में आ के, कर कृपा भगवान॥
है भरोसा श्याम पर अब, है मिलन की आस।
मन अगर निश्छल हमारा, कृष्ण करते वास॥
प्रेम की ही भूख उसको, प्रेम की ही प्यास।
प्रेम की अभिव्यक्ति है, दिव्य क्रीड़ा रास॥
श्रद्धा सहित समर्पित
विवेक अग्रवाल
(बोलो बांके बिहारी लाल की जय)
Fri, 28 Oct 2022 - 08min - 61 - ग़ज़ल – घरों के साथ जीवन भी सजाते हैं दिवाली पर
घरों के साथ जीवन भी सजाते हैं दिवाली पर।
नयी उम्मीद के दीपक जलाते हैं दिवाली पर।
चमकते हैं ये घर आँगन ज़रा झाड़ू लगा अंदर,
ये जाले बदगुमानी के हटाते हैं दिवाली पर।
जुबां मीठी बने सबकी न कड़वे बोल हम बोलें,
बना ऐसी मिठाई इक खिलाते हैं दिवाली पर।
प्रकाशित मन करे ऐसा जलाओ दीप हर घर में,
दिलों से आज अँधियारा मिटाते हैं दिवाली पर।
लबों पर मुस्कुराहट ला भुला दे सब ग़मों को जो,
चलो सब फुलझड़ी ऐसी चलाते हैं दिवाली पर।
ख़ुशी-ग़म धूप छाया हैं कभी हँसना कभी रोना,
मायूसी छोड़ गाते-गुनगुनाते हैं दिवाली पर।
हमें इक जिंदगी मिलती मोहब्बत में ये कट जाए,
गिले-शिकवे सभी अपने भुलाते हैं दिवाली पर।
न जाने कब यहाँ जीवन की अपनी शाम हो जाए,
सभी मतभेद तज मिलते-मिलाते हैं दिवाली पर।
बड़ी मुश्किल से मिलते हैं यहाँ पर यार कुछ सच्चे,
जो अपने रूठ कर बिछड़े मनाते हैं दिवाली पर।
नहीं सोना नहीं चांदी नहीं हीरा नहीं मोती,
गरीबों की दुआ थोड़ी कमाते हैं दिवाली पर।
बड़े छोटे बहुत रिश्ते हमारी ज़िन्दगी में हैं,
चलो इंसानियत को भी निभाते हैं दिवाली पर।
ज़रा सोचो यहाँ दुनिया में सब खुश हों तो कैसा हो,
किसी की ज़िन्दगी से ग़म चुराते हैं दिवाली पर।
ये जीवन एक उत्सव है बड़ी किस्मत से मिलता है,
खुदा का क़र्ज़ थोड़ा तो चुकाते हैं दिवाली पर।
- विवेक अग्रवाल 'अवि'
Write to me on HindiPoemsByVivek@gmail.com
Fri, 21 Oct 2022 - 06min - 60 - ग़ज़ल - इश्क़ भी तुम ने किया (Ghazal - Ishq Bhi Tumne Kiya)
ग़ज़ल - इश्क़ भी तुम ने किया बस यूँ ही आते जाते
इश्क़ भी तुम ने किया बस यूँ ही आते जाते।
दर्द कितना है दिया हम को यूँ जाते जाते।
दोस्ती ख़ूब निभाई थी बड़े दिन हमसे,
फ़र्ज़ दुश्मन का भी बनता है निभाते जाते।
मेरे बस में तो नहीं है कि जला दूँ इनको,
ख़त जो तुमने थे लिखे उन को जलाते जाते।
मुस्कुराहट है लबों पर जो सजाई झूठी,
रोक कर हैं जो रखे अश्क़ बहाते जाते।
कैसे काटेंगे सफ़र ज़िंदगी का बिन तेरे,
आख़िरी वस्ल की यादें तो सजाते जाते।
शायर - विवेक अग्रवाल 'अवि'
सुर और संगीत - रानू जैन
Write to us on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Instagram - hindipoemsby_vivek
Thu, 13 Oct 2022 - 06min - 59 - ग़ज़ल - मेरी मुहब्बत नयी नहीं है (Ghazal - Meri Muhabbat Nayi Nahin Hai)
ग़ज़ल - मेरी मुहब्बत नयी नहीं है
बड़ी पुरानी है ये कहानी, मेरी मुहब्बत नयी नहीं है।
जो फाँस बन के गड़ी हुयी है, जिगर में हसरत नयी नहीं है।
कभी लिखे थे दिलों पे अपने, जो नाम इक दूसरे के हमने,
नहीं धुलेंगे वो आंसुओं से, छपी इबारत नयी नहीं है।
न तू ये जाने जगह जो मैंने, तेरे लिये थी कभी बनायी,
सजा के दिल में तुझे है पूजा, मेरी इबादत नयी नहीं है।
दवा नहीं मिल रही है इसकी, बुख़ार हमको जो हो गया है,
है आग सीने में इक पुरानी, मेरी हरारत नयी नहीं है।
जो बात उसको बता न पाये, सुना रहे हैं यहाँ सभी को,
ग़ज़ल लिखी आज फिर से 'अवि' ने, खुदा की रहमत नयी नहीं है।
______________________________
Vocal - Dr. SC Rastogi
Music & Harmonium - Mrs. Sadhna Rastogi
Tabla - Amol
Lyrics - Vivek Agarwal 'Avi'
You can reach us at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Sat, 08 Oct 2022 - 06min - 58 - ग़ज़ल - सुनो तुम आत्महत्या से कभी हित हो नहीं सकता
कभी कभी जीवन से निराश हो चुके व्यक्ति आत्महत्या तक के बारे में सोचने लगते हैं जबकि यह किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। अभी कुछ दिनों पहले विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर मैंने एक ग़ज़ल के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों को नकारात्मक सोच से निकल सकारात्मकता की ओर जाने का सन्देश देने का प्रयास किया गया है।
साथ ही यह भी चेष्टा रही है कि शुद्ध हिंदी के शब्दों का प्रयोग कर एक सम्पूर्ण ग़ज़ल लिखी जाए जिस से हिंदी कवि भी इस विधा की ओर आकर्षित हों। आशा करता हूँ की श्रोताओं को पसंद आएगी
#ghazal #ghazals #hindipoetry #hindipoems #hindipoem #shayri
_____________
Write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Sat, 01 Oct 2022 - 06min - 57 - प्रयाण गीत (पञ्चचामर छंद)
अजेय सैनिकों चलो, लिये तिरंग हाथ में।
समक्ष शत्रु क्या टिके, समस्त हिन्द साथ में॥
ललाट गर्व से उठा, स्वदेश भक्ति साथ है।
अशीष मात का मिला, असीम शक्ति हाथ है॥
चले चलो बढ़े चलो, कि देश है पुकारता।
सवाल आज आन का, कि आस से निहारता॥
सदैव शौर्य जीतता, कि शक्ति ही महान है।
कि वीर की वसुंधरा, यही सदा विधान है॥
चढ़ा लहू कटार से, यहाँ उतार आरती।
भले तू खंड-खंड हो, रहे अखंड भारती॥
महान मातृभूमि का, चुका सकें न ऋण कभी।
यहीं जियें यहीं मरें, सपूत मात के सभी॥
खड़े रहें डटे रहें, थकान भूख प्यास में।
स्वदेश प्रेम आपकी, बसा प्रत्येक श्वास में॥
हिमाद्रि मार्ग में खड़ा, उतंग तुंग तोड़ दो।
प्रवाहिनी जहाँ दिखे, नदी प्रवाह मोड़ दो॥
असंख्य शत्रु सामने, गिरे न स्वेद भाल से।
स्वदेश के लिए लड़ो, महा कराल काल से॥
अतीव कष्ट भी मिले, न शीश ये कभी झुके।
न लोभ मोह में फँसे, जवान ये नहीं रुके॥
अदम्य साहसी सभी, नहीं करें अधीरता।
न अस्त्र से न शस्त्र से, जयी सदैव वीरता॥
अनन्य देश प्रेम है, सदैव वो रहे डटे।
समस्त विश्व साक्ष्य है, न युद्ध से कभी हटे॥
अराति हिन्द पे चढ़ा, प्रचंड वार के लिए।
भुजा सशक्त है दिखा, उठा प्रहार के लिए॥
अक्षम्य कृत्य दुष्ट का, इसे क्षमा नहीं करो।
कि काट शीश शत्रु के, समुद्र रक्त से भरो॥
अजेय शूर वीर तू, उठा धनुष कृपाण को।
कि भेद लक्ष्य व्योम में, चला अचूक बाण को॥
समाप्त शत्रु आज हो, समस्त दम्भ को हरो।
उठा सके न शीश फिर, समूल नाश तुम करो॥
न मौत अंत वीर का, कथा समस्त जग कहे।
समान सूर्य चंद्र के, सदैव विश्व में रहे॥
न तू न मैं न ये बड़ा, बड़ा स्वदेश है सदा।
सदैव स्वाभिमान हो, स्वतंत्र राष्ट्र सर्वदा॥
प्रयाण गीत गा रहे, स्वदेश भक्ति काम है।
जवान को प्रणाम है, प्रणाम है प्रणाम है॥
स्वरचित - विवेक अग्रवाल 'अवि'
(भारतीय सेना और श्री जय शंकर प्रसाद जी को समर्पित)
Sat, 10 Sep 2022 - 04min - 56 - श्रीकृष्ण बाल कथा (Shri Krishna Baal Katha)
श्रीकृष्ण माहात्म्य
हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति)
प्रथम सर्ग - श्रीकृष्ण बाल कथा
श्रीकृष्ण की सुन लो कथा तुम, आज पूरे ध्यान से।
भवसागरों से मुक्ति देती, यह कथा सम्मान से॥
झंझावतों की रात थी जब, आगमन जग में हुआ।
प्रारब्ध में जो था लिखा तय, कंस का जाना हुआ॥
गोकुल मुझे तुम ले चलो अब, हो प्रकट बोले हरी।
माया वहाँ मेरी है जन्मी, तेज से है वो भरी॥
ज्यूँ कृष्ण का आना हुआ त्यूँ, बेड़ियाँ सब खुल गयीं।
ताले लगे थे द्वार पर जो, चाभियाँ खुद लग गयीं॥
प्रहरी थे कारागार के सब, नींद में सोये हुये।
जैसे किसी माया में पड़ कर, स्वप्न में खोये हुये॥
इक टोकरी में डाल बाबा, नन्द घर को चल पड़े।
वर्षा प्रबल यूँ हो रही थी, तात चिंता में बड़े॥
कैसे करें हम पार नदिया, बाढ़ इसमें आ गयी।
जब छू लिये चरणन तिहारे, शांति यमुना पा गयी॥
फन वासुकी छतरी बना कर, वृष्टि से रक्षा किये।
उस पार बाबा आ गये तब, टोकरी सर पर लिये॥
अपने लला को साथ ले कर, नन्द बाबा से मिले।
पूरी कथा उनको सुना कर, आस की किरणें खिले॥
बाबा कहे जो भाग्य में है, अब वही होगा घटित।
है ले लिया अवतार प्रभु ने, देवताओं के सहित॥
थीं नन्द के घर माँ यशोदा, योगमाया साथ में।
दोनों खुशी से सो रही थीं, हाथ डाले हाथ में॥
वसुदेव ने सौंपा हरी को, योगमाया साथ ले।
लाला निहारे तात को जब, छोड़ कर बाबा चले॥
फिर कंस कारागार आया, योगमाया छीन ली।
पर दिव्य देवी मुस्कुराती, खिलखिलाती उड़ चली॥
बोली कि तेरा काल दुष्टे, आ गया है अब निकट।
जल्दी हरी आकर हरेंगे, विश्व के संकट विकट॥
माँ देवकी वसुदेव बाबा, जेल में ही रह गये।
पर आपके सम्बल सहारे, कष्ट सारे सह गये॥
बचपन बिताया माँ यशोदा, संग क्रीड़ा कर कई।
गोकुल निवासी धन्य होते, देख लीला नित नई॥
यूँ बालपन में ही किया था, दानवों का सामना।
संहार कर फिर कंस का की, पूर्ण सबकी कामना॥
विष-सर्प से दूषित भयी जब, जल किसी ने न पिया।
यमुना नदी में कूद कर तब, कालिया मर्दन किया॥
गिरिराज को अंगुल उठाकर, सात दिन धारण किया।
अभिमान सारा इन्द्र का यूँ, एक पल में हर लिया॥
सम्मान नारी का करें सब, सीख सबने ये लिया।
गीता सुनाकर पार्थ का भी, मार्गदर्शन कर दिया॥
अवतार ले जग को सुधारा, कम हुआ जब धर्म है।
है आपने ही ये सिखाया, श्रेष्ठ सबसे कर्म है॥
(इति-प्रथम सर्ग)
श्रद्धा सहित
विवेक अग्रवाल
(मौलिक और स्वलिखित)
Fri, 19 Aug 2022 - 05min - 55 - ग़ज़ल - नहीं फ़ख़्र-ए-वतन उसका ये हिंदुस्तान थोड़े है (Ghazal)
ग़ज़ल - नहीं फ़ख़्र-ए-वतन उसका ये हिंदुस्तान थोड़े है
लुटाते जान सैनिक ही हमारी जान थोड़े है।
बचाते अजनबी को भी कोई पहचान थोड़े है।
नहीं अहसान मानो तो समझ इक बार हम जायें,
मगर मारो जो तुम पत्थर वहाँ ईमान थोड़े है।
ख़िलाफ-ए-'मुल्क साजिश कर जो दुश्मन की ज़बाँ बोले,
नहीं फ़ख़्र-ए-वतन उसका ये हिंदुस्तान थोड़े है।
कहे भारत के टुकड़े जो वो अपना हो नहीं सकता,
पढ़ा है तीस सालों तक अभी नादान थोड़े है।
चलो मिल कर बनाते हैं वतन खुशहाल ये अपना,
सभी का घर यहाँ पर है कोई मेहमान थोड़े है।
बढे ताकत बने अव्वल हमारा मुल्क दुनिया में,
सभी की है यही मंजिल फ़क़त अरमान थोड़े है।
Lyrics - Vivek Agarwal
Music & Singer - Ranu Jain
Sat, 13 Aug 2022 - 05min - 54 - ज़रा याद करो कुर्बानी (Zara Yaad Karo Kurbani)
बचपन से खूब सुनी हैं, दादी नानी से कहानी।
जादुई परियों के किस्से, और सुन्दर राजा रानी।
कथा मैं उनकी सुनाता, जो देश के हैं बलिदानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
आज़ाद हवा में साँसे, खुल कर हम सब ले पाये।
क्यूँकि कुछ लोग थे ऐसे, जो अपनी जान लुटाये।
उन सब की बात करूँ मैं, नहीं जिनका बना है सानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
सन सत्तावन में देखी, आज़ादी की पहली लड़ाई।
सबसे आगे जो निकली, नाम था लक्ष्मीबाई।
नारी नहीं थी अबला, वो थी झांसी की रानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
संख्या में बहुत बड़ी पर, गोरों की पलटन भागी।
नेताजी की सेना ने, गोली पर गोली दागी।
आज़ाद हिन्द सेना से, बुनियाद हिली बिरतानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
आज़ाद लड़े आखिर तक, जब दिशा घिर गयीं सारी।
जब अंतिम गोली बची तब, खुद के मस्तक में मारी।
प्रयागराज में अब भी, उनकी है सजी निशानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
लाला लाजपत जी ने, लाठी खायी थी सर पर।
माटी का जो कर्ज़ा था, सारा वो चुकाया मर कर।
सबसे आगे वो खड़े थे, सुन लो मेरी बयानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
वीर भगत बचपन से, आज़ादी के दीवाने।
फाँसी का फंदा चूमा, गये हँसते मस्ताने।
सोचो उनके बारे में, तो होती है हैरानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
जलियाँ बाग़ में कितने, लोगों ने गोली खायी।
जब लाखों घर उजड़े तब, हमने आज़ादी पायी।
कभी न पड़ने पाये, उनकी ये याद पुरानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
सावरकर के लेखों से, अंग्रेज़ थे इतना डरते।
बात बात पर उनको, गिरफ्तार वो करते।
जब रुका नहीं मतवाला, भेजा फिर काले पानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
कोमाराम ने कहा था, जल जंगल जमीं हमारा।
कितनों को उसने जगाया, देकर जोशीला नारा।
लड़ते लड़ते जां तज दी, फिर उसने भरी जवानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
गांधी नेहरू तो सुने हैं, पर खुदीराम को भूले।
ऐसे कितने ही बहादुर, यौवन में फाँसी झूले।
अंग्रेज़ों को है भगाना, ये दिल में सबने थी ठानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
ये दिन है बड़ा मुक़द्दस, चलो मिल कर गीत ये गाएँ।
भूले बिसरे वीरों को, श्रद्धा से सीस नवाएँ।
है 'अवि' की कामना छोटी, सबको ये कथा सुनानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
(आदरणीय कवि प्रदीप जी और लता जी की प्रेरणा से लिखी यह कविता लाखों अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का एक प्रयास है)
--------------------------------------------------
Write to me at HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Thu, 04 Aug 2022 - 05min - 53 - ग़ज़ल - दिन रात मुझे याद (Ghazal - Din Raat Mujhe Yaad)
दिन रात मुझे याद यूँ आया न करो तुम।
हर वक़्त यूँ तड़पा के सताया न करो तुम।
दिन भर तो मुझे नींद नहीं होती मयस्सर,
आ ख्वाब में हर रात जगाया न करो तुम।
इक वक़्त था मुस्कान हमेशा थी लबों पर,
वो वक़्त मुझे याद दिलाया न करो तुम।
लगता है तेरे दिल में कहीं कुछ तो बचा है,
जो भी है दिल में वो छुपाया न करो तुम।
इस वक़्त से बढ़कर है नहीं कुछ भी यहाँ पर,
बेकार की बातों में गँवाया न करो तुम।
माना कि तेरे दिल में नहीं इश्क़ मेरा अब,
अपना जो कभी था वो पराया न करो तुम।
_____________________
लेखन - विवेक अग्रवाल 'अवि'
संगीत और सुर - रानू जैन
Tue, 26 Jul 2022 - 06min - 52 - शारदा स्तुति (Sharda Stuti)
शारदा स्तुति
हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति)
है हंस पर आरूढ़ माता, श्वेत वस्त्रों में सजी।
वीणा रखी है कर तिहारे, दिव्य सी सरगम बजी॥
मस्तक मुकुट चमके सुशोभित, हार पुष्पों से बना।
फल फ़ूल अर्पण है चरण में, हम करें आराधना॥
संगीत का आधार हो माँ, हर कला का श्रोत हो।
जग में प्रकाशित हो रही जो, वेद की वह ज्योत हो॥
वरदायिनी पद्मासिनि माँ, अब यही अभियान हो।
हम सब चलें सत्मार्ग पर अब, ना हमें अभिमान हो॥
माँ शारदे ये वर हमें दे, बुद्धि का विस्तार हो।
अपनी इसी पावन धरा पे, धर्म का संचार हो॥
श्रद्धा सहित
--------------------------------
सुर - डॉ सुभाष चंद्र रस्तोगी
लेखन - विवेक
संगीत - अमोल
Fri, 17 Jun 2022 - 07min - 51 - आओ पर्यावरण बचायें (Let us save environment)
आओ पर्यावरण बचायें
यह प्रकृति हम से नहीं, इस प्रकृति से हम हैं।
प्रकृति सरंक्षण हेतु हम जितना भी करे कम है।
पंच तत्व बन प्रकृति ही इस तन को निर्मित करती है।
सौंदर्य सुधा की सुरभि से सबको आकर्षित करती है।
जीवनदायी प्रकृति करती है सब का पालन पोषण।
निज स्वार्थ में हम कर बैठे इस देवी का शोषण।
भूमि हमको भोजन देती पर हम इसको विष देते।
दूषित करते उन नदियों को जिनसे हम जल लेते।
प्राणदायिनी वायु तक को भी हमने शुद्ध ना छोड़ा।
जला कोयला-डीजल-कूड़ा धुआँ हर तरफ छोड़ा।
जो वृक्ष हमें सौगात में देते फल-फूल और छाया।
काट काट कर काया उनकी अपना संसार बनाया।
ऊँचे हिमशिखर हों या फिर महासागर की गहराई।
दुर्गम सुदूर स्थानों पर भी प्लास्टिक हमने पहुँचाई।
एसी-फ्रिज-उपकरण हमारे ऐसी गैसें छोड़ रहे हैँ ।
ओजोन परत जो हमें बचाती उसको ही तोड़ रहे हैँ।
मानव जाति को ईश्वर ने दिया है बुद्धि का उपहार।
सोचो ये प्रकृति ही है अपने पूरे जीवन का आधार।
आओ मिल कर यह शपथ लें एक बदलाव लायेंगे।
स्वयं भी जागरूक बनेंगे और औरों को भी जगायेंगे।
स्वरचित और मौलिक
विवेक अग्रवाल 'अवि'
Sun, 12 Jun 2022 - 03min - 49 - Shiv Vandana - मैं बस शिवा हूँ (Mein Bas Shiva Hoon)
न हूँ मैं मेधा, न बुद्धि ही मैं हूँ। अहंकार न हूँ न चित्त ही मैं हूँ। न नासिका में न नेत्रों में ही समाया। न जिव्हा में स्थित न कर्ण में सुनाया। न मैं गगन हूँ न ही धरा हूँ। न ही हूँ अग्नि न ही हवा हूँ। जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक। मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक। नहीं प्राण मैं हूँ न ही पंचवायु। नहीं पंचकोश और न ही सप्तधातु। वाणी कहाँ बांच मुझको सकी है। मेरी चाल कहाँ कभी भी रुकी है। किसी के हाथों में नहीं आच्छादित। न ही किसी और अंग से बाधित। जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक। मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक। नहीं गुण कोई ना ही कोई दोष मुझमें। न करूँ प्रेम किसी को न रोष मुझमें। लोभ मद ईर्ष्या मुझे कभी न छूते। धर्म अर्थ काम भी मुझसे अछूते। मैं स्वयं तो मोक्ष के भी परे हूँ। जो सब जहाँ है वो मैं ही धरे हूँ। जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक। मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक। न पुण्य की इच्छा न पाप का संशय। सुख हो या दुःख हो न मेरा ये विषय। मन्त्र तीर्थ वेद और यज्ञ इत्यादि। न मुझको बाँधे मैं अनंत अनादि। न भोग न भोगी मैं सभी से भिन्न। न ही हूँ पुलकित और न ही खिन्न। जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक। मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक। अजन्मा हूँ मेरा अस्तित्व है अक्षय। मुझे न होता कभी मृत्यु का भय। न मन में है शंका मैं हूँ अचर। जाति न मेरी न भेद का डर। न माता पिता न कोई भाई बंधु। न गुरु न शिष्य मैं अनंत सिंधु। जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक। मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक। न आकार मेरा विकल्प न तथापि। चेतना के रूप में मैं हूँ सर्वव्यापी। यूँ तो समस्त इन्द्रियों से हूँ हटके। पर सभी में मेरा प्रतिबिम्ब ही झलके। किसी वस्तु से मैं कहाँ बँध पाया। पर प्रत्येक वस्तु में मैं ही समाया। जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक। मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक। (आदिगुरु श्री शंकराचार्य जी की बाल्यावस्था में लिखी निर्वाण षट्कम का अपने अल्प ज्ञान और सीमित काव्य कला में सरल हिंदी में रूपांतर करने की एक तुच्छ चेष्टा।) गुरुदेव को नमन के साथ विवेक ________________________ You can write to me at HindiPoemsByVivek@gmail.com
Fri, 06 May 2022 - 05min - 48 - श्रीकृष्ण स्तुति (Sri Krishna Stuti)
श्रीकृष्ण मेरे इष्ट भगवन, नित्य करता ध्यान मैं।
मुरली मनोहर श्याम सुन्दर, भक्तिरस का गान मैं॥
कोमल बदन चन्दन सजा है, भव्य यह श्रृंगार है।
कर में सजी वंशी सुनहरी, देखता संसार है॥
सम्पूर्ण जग में आप ही हो, आप से ही सब बना।
है आप पर सर्वस्व अर्पण, आप की आराधना॥
मम मात तुम तुम तात हो तुम, बन्धु तुम ही हो सखा।
प्रियतम तुझे ही मानता मैं, तुम बिना क्या है रखा॥
मनमोहना है छवि तिहारी, श्वास का आधार है।
विश्वास है मेरा यही की, मुक्ति का तू द्वार है॥
सविनय निवेदन आप से है, काज मेरे कीजिये।
मेरा समय जब पूर्ण हो तो, मोक्ष मुझको दीजिये॥
श्रद्धा सहित
विवेक अग्रवाल
-------------------------------
Singer - Dr. SC Rastogi
Lyrics - Vivek Agarwal
Background Music - KalRav Music
Write to me on HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Thu, 28 Apr 2022 - 07min - 47 - मैंने राम को देखा है
कौन हैं राम कैसे थे राम,
कब थे राम कहाँ है राम?
अक्सर ऐसे प्रश्न उठाते,
लोगों को मैंने देखा है।
श्रद्धा-सूर्य पर संशय-बादल,
मंडराते मैंने देखा है।
है उनको बस इतना बतलाना,
मैंने राम को देखा है ।
पितृ वचन कहीं टूट ना जाये
सौतेली माँ भी रूठ ना जाये
राजसिंहासन को ठुकराकर
परिजनों को भी बहलाकर
एक क्षण में वैभव सारा छोड़
रिश्ते नातों के बंधन तोड़
कुल-देश-धर्म की मर्यादा पर
सर्वस्व लुटाते देखा है
हाँ मैंने त्याग में राम को देखा है।
केवट को बाहों में भर लेना
मित्रवत रीछ वानर की सेना
शबरी के जूठे बेरों का प्यार
गिद्धराज से पितृसम व्यवहार
गिलहरी की पीठ हाथ फिराना
समरसता का सुन्दर पाठ पढ़ाना
निज आचरण का बना उदाहरण
हर भेद मिटाते देखा है
हाँ मैंने न्याय में राम को देखा है।
श्री विष्णुरूप हैं मेरे रघुनंदन
जो करें नित महादेव का वंदन
विद्वानों के समक्ष शीश झुकाना
रात्रि भर गुरु के चरण दबाना
धनुष हाथ ले पहरा देना
घर घर जाकर भिक्षा लेना
तीनों लोकों के स्वामी होकर
सेवा करते भी देखा है
हाँ मैंने विनम्रता में राम को देखा है।
यज्ञ भंग करते दैत्य विराट
रामबाण ने दिये मस्तक काट
प्रचंड शिव धनुष का तोड़ना
जनक नंदिनी से नाता जोड़ना
पापी रावण को दे उचित दंड
की विभीषण पर कृपा अखंड
शक्ति के समुचित सद उपयोग
का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देखा है
हाँ मैंने पराक्रम में राम को देखा है।
विश्वामित्र का आना दशरथ द्वार
माँ अहिल्या का होते उद्धार
भरत लक्ष्मण का सर्वस्व अर्पण
बजरंग बली का सम्पूर्ण समर्पण
अंगद की अतुलित शक्ति
विभीषण की अन्नय भक्ति
रामेश्वरम के पावन तट पर
पत्थरों को तैरते देखा है
हाँ मैंने विश्वास में राम को देखा है।
राम ही साकार है,
और निराकार भी राम हैं।
राम में सारे गुण भरे,
हर सद्गुण में दिखते राम हैं।
राम हैं हर मंदिर में,
मनमंदिर में शोभित राम हैं।
राम से ही सृष्टि सारी,
हर कण में समाये राम हैं।
राम पिता का पावन पुरुषार्थ,
राम ही माँ की निश्छल ममता।
राम सखा के स्नेहालिंगन में,
गुरु कृपा में राम ही दिखता।
वीरों के शौर्य में राम हैं,
राम बसे हर ज्ञानी में।
परमार्थ का हर कार्य राम का,
मुझे दिखे राम हर दानी में।
जीवन पथ हो जाये दुष्कर,
तो अपने सहचर राम हैं।
जितने प्रश्न भरे हैं अंदर,
सबका उत्तर राम हैं।
राम पर यदि ध्यान दिया,
हर संशय तब मिट जायेगा।
राम के गुण जो भी अपना ले,
वही राम हो जायेगा।
राम की इस दुनिया में ऐसा होते देखा है,
मैंने राम को देखा है।
मैंने राम को देखा है।
श्रद्धा सहित - विवेक अग्रवाल
Sun, 10 Apr 2022 - 06min - 46 - सरस्वती वंदना - आशी (Saraswati Vandana - Music by Aashi)
सरस्वती वंदना
हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति)
है हंस पर आरूढ़ माता, श्वेत वस्त्रों में सजी।
वीणा रखी है कर तिहारे, दिव्य सी सरगम बजी॥
मस्तक मुकुट चमके सुशोभित, हार पुष्पों से बना।
फल फ़ूल अर्पण है चरण में, हम करें आराधना॥
संगीत का आधार हो माँ, हर कला का श्रोत हो।
जग में प्रकाशित हो रही जो, वेद की वह ज्योत हो॥
वरदायिनी पद्मासिनि माँ, अब यही अभियान हो।
हम सब चलें सत्मार्ग पर अब, ना हमें अभिमान हो॥
देवी यही है कामना सब, लोग मिल आगे बढ़ें।
अपने सभी अंतर भुलाकर, ज्ञान की सीढ़ी चढ़ें॥
माँ शारदे ये वर हमें दे, बुद्धि का विस्तार हो।
अपनी इसी पावन धरा पे, धर्म का संचार हो॥
श्रद्धा सहित
विवेक अग्रवाल
(मौलिक और स्वलिखित)
Write to me on HindiPoemsByVivek@gmail.com
Fri, 01 Apr 2022 - 06min - 45 - प्रकृति का पाठ (Lessons from Nature)
आओ बच्चों आज तुमको एक पाठ नया पढ़ाता हूँ।
प्रकृति हमको क्या सिखलाती, ये तुमको बतलाता हूँ।
देखो कैसे पत्थर खा के भी, पेड़ हमें फल देते हैं।
क्षमा-दान से बड़ा कुछ नहीं, ये हम सबसे कहते हैं।
पर्वत से सागर तक नदिया, लम्बा सफर है करती।
निज लक्ष्य तक बढ़ो निरंतर, सीख यही है मिलती।
सबका भार उठाये मस्तक पर, देखो धरती माता।
सहनशीलता का अर्थ क्या, इससे समझ में आता।
ज्वार-भाटा नित्य आता पर, सागर सीमा ना तोड़े।
सुख-दुःख में धैर्य रखें हम, मर्यादा कभी ना छोड़ें।
देखो कैसे रोज नियम से, सूरज है आता जाता।
अनुशासन का पाठ हमको, अच्छे से सिखलाता।
झंझावत कितने आयें परन्तु, पर्वत अडिग है रहता।
कठिन समय में दृढ़ रहने की बात हमसे कहता।
आसमान में स्थिर ध्रुव तारा, भटकों को राह दिखाता।
अटल इरादे अगर हमारे, सब कुछ संभव हो जाता।
सुन्दर सुरभित पुष्प यहाँ, सबको सुख पहुंचाते।
हम भी यूँ खुशियां बरसायें, ये हमको समझाते।
जैसा बीज खेत में डालो, वैसी फसल है उगती।
ये देख हम सबको, अच्छे कर्म की प्रेरणा मिलती।
भाषा गणित इतिहास कला, इन सबसे बढ़ता ज्ञान।
पर अच्छे गुण पाकर ही, एक व्यक्ति बनता महान।
प्रकृति के कण कण में भरा है, सीखों का भण्डार।
इस ज्ञान से चलो सँवारे, मिल कर अपना संसार।
स्वरचित
विवेक अग्रवाल
Sat, 26 Mar 2022 - 04min - 44 - होली (Holi)
आओ मिल कर खेलें होली
सबसे न्यारी अपनी टोली
सभी पुराने क्लेश भुलाकर
सबसे बोलें मीठी बोली
लाल हरे और पीले नीले
देखो मेरे रंग चटकीले
भर ली मैंने नयी पिचकारी
रंग दूंगा मैं दुनिया सारी
सुबह सवेरे सोनू जागा
उसके पीछे मोनू भागा
वो छिप गया लकी सयाना
नहीं चलेगा कोई बहाना
बंद करो ये आंखमिचौली
आओ मिल कर खेलें होली
रंग लगायें गुंझिया खाएं
झूमे नाचें खुशी मनाएं
खेल कूद कर घर को आये
रगड़ रगड़ कर हम नहाये
बड़े जोर की भूख लगी अब
पूरी हलवा खायें मिल सब
होली का त्यौहार है न्यारा
बीत गया दिन कितना प्यारा
हमें उदास देख माँ बोली
फिर आएगी प्यारी होली
Fri, 18 Mar 2022 - 02min - 43 - ग़ज़ल - तू ही बता (Ghazal - Tu Hi Bata)
ग़ज़ल - तू ही बता
क्यों हर समय यादें तेरी आती हमें तू ही बता।
सोता हूँ तो सपने तेरे मुझको दिखें तू ही बता।
सीने में हैं तूफाँ बहुत दिल है मगर खाली मेरा।
हाल-ए-जिगर जाने न तू कैसे कहें तू ही बता।
है मतलबी सारा जहाँ सोचा कि तुम होगी जुदा।
तू भी मगर खुदगर्ज है क्या हम करें तू ही बता।
छोटी सी थी मेरी खता ये बात है तुझको पता।
इतनी बड़ी दी है सजा कैसे सहें तू ही बता।
चाहूँ नहीं अपने ग़मों को इस जहाँ से बाँटना।
आँखों में हैं आँसू बहुत कैसे बहें तू ही बता।
फ़िरदौस की ख्वाहिश नहीं तेरा अगर दीदार हो।
दिल में सजे सपने तेरे कैसे हटें तू ही बता।
बन के ग़ज़ल मेरेे लबों पे आज फिर हो सज गयी।
तेरे सिवा कुछ और हम कैसे लिखें तू ही बता।
- विवेक अग्रवाल 'अवि' (सर्व अधिकार सुरक्षित)
स्वरचित व मौलिक
Fri, 11 Mar 2022 - 04min - 42 - ग़ज़ल - सपने तेरे (Ghazal - Sapne Tere)
ग़ज़ल - सपने तेरे
जो सब कहें सपने तेरे, मुश्किल बड़े तो क्या हुआ।
तेरी रज़ा तेरा सफर, अड़चन पड़े तो क्या हुआ।
पथ पर अगर पत्थर पड़े, ठोकर लगे काँटे चुभें।
आगे बढ़ो हिम्मत करो, गिर भी गये तो क्या हुआ।
जो धुन्ध में रस्ता कहीं, खोता लगे थमना नहीं।
चलते चलो मंज़िल अगर, ना भी दिखे तो क्या हुआ।
होते हैं सच सपने सभी, कोशिश करो जी जान से।
थोड़े समय तुमने अगर, दुख भी सहे तो क्या हुआ।
हर्फ़-ए-अना तुझको कभी, छू भी न पाये ध्यान रख।
ऊँचाइयाँ तेरे कदम, छूती रहे तो क्या हुआ।
डरना नहीं डिगना नहीं, दिल में रखो ये हौसला।
जलते हुये दुनिया अगर, फब्ती कसे तो क्या हुआ।
तेरे लिये मेरी दुआ तुझ पर रहे 'अवि' का करम।
रोशन रहे जो तीरगी, तुझको मिले तो क्या हुआ।
- विवेक अग्रवाल 'अवि' (सर्व अधिकार सुरक्षित)
HindiPoemsByVivek@Gmail.com
Fri, 04 Mar 2022 - 05min - 41 - शिव स्तुति (Shiv Stuti)
शिव स्तुति
स्वभाव से हैं जो सरल, त्रिनेत्र में रखें अनल।
जटाओं में भागीरथी, कण्ठ में धरें गरल॥
सोम सज्ज भाल है, वज्र वक्ष विशाल है।
जिनका नाम मात्र ही, काल का भी काल है॥
दिव्य जिनका रूप है, सौभाग्य का स्वरूप है।
कपूर कान्ति वर्ण पर, भस्म और भभूत है॥
आसन व्याघ्र चर्म है, धर्म का जो मर्म है।
जिनकी इच्छा मात्र से, घटित प्रत्येक कर्म है॥
औघड़ आदिनाथ हैँ, भूत प्रेत साथ हैँ।
क्या मनुज क्या पशु, वो तो विश्वनाथ हैँ॥
ज्ञान की जो ज्योत हैँ, कला का भी स्त्रोत हैँ।
जिनकी कृपा से देव, शक्ति से ओत प्रोत हैँ॥
सूर्य में आलोक हैँ, वेदों में जो श्लोक हैँ।
व्याप्त जो हर जीव में, जिनसे तीनों लोक हैँ॥
ज्योति का स्तम्भ हैं, सृष्टि का प्रारम्भ हैं।
अन्त का भी अन्त जो, आरम्भ का आरम्भ हैं॥
अचल अटल अमर अखंड, रौद्र रूप है प्रचंड।
भेद भाव छुआ नहीं, देवों को भी दें जो दंड॥
जो देवों में विशेष हैं, करे नमन सुरेश हैं।
स्वर्ग धरा पाताल में, एक वही अशेष हैं॥
गूँजता है ये गगन, भक्त हैं सभी मगन।
जो देवों के भी देव हैं, उन्हीं को है मेरा नमन॥
श्रद्धा सहित
विवेक अग्रवाल
(मौलिक और स्वलिखित)
Thu, 03 Mar 2022 - 03min - 40 - मैं प्रलय हूँ (Main Pralay Hoon)
मैं प्रलय हूँ
मैं प्रलय हूँ।
अरि-मस्तकों को काट काट;
शोणित-सुशोभित उन्नत ललाट,
सर्व व्याप्त विश्व रूप विराट।
रणचण्डी का उन्मुक्त अट्टहास;
रिपुह्रदय में कर भय का निवास,
अग्नि उगले मेरी हर एक श्वास।
करता सुनिश्चित निज जय हूँ,
मैं प्रलय हूँ।
अविरल मेरी गति निरंतर,
पग थमे नहीं तूफानों से।
मैं थका नहीं मैं डिगा नहीं,
पथ में पड़ती चट्टानों से।
मैं भगीरथ मैं ध्रुव;
मैं अचल अटल निश्चय हूँ,
मैं प्रलय हूँ।
मिट गये मुझे मिटाने वाले,
मैं विद्यमान यहाँ अनन्त काल से।
मैं रुका नहीं मैं झुका नहीं,
ना तिलक मिटा कभी मेरे भाल से।
मैं विंध्य मैं नगपति;
मैं सुदृढ़ सबलता परिचय हूँ,
मैं प्रलय हूँ।
मैं उद्गम लोहित नदियों का,
मैं ही रक्त का महासागर।
धर्म मार्ग पर हर त्याग गौण है,
मैं करता यह सत्य उजागर।
मैं ऋषि दधीचि मैं शिवि नरेश;
मैं देता दान अभय हूँ,
मैं प्रलय हूँ।
राष्ट्र धर्म के पावन तप में,
सहर्ष भस्म हो वो आहुति मैं।
मातृभूमि के चिर वंदन में,
श्रद्धा से समर्पित स्तुति मैं।
संकट गहन तिमिर चीरता;
निजअग्नि में प्रज्जवलित सूर्योदय हूँ,
मैं प्रलय हूँ।
मैं विस्तृत अवनि से अम्बर तक,
अंतरिक्ष का मैं वक्ष चीरता।
आरम्भ तू मेरा अंत भी तेरा।
सब साक्ष्य बन देखें मेरी वीरता।
मैं महाविनाश में निहित सृजन;
मैं महाकाल मृत्यंजय हूँ,
मैं प्रलय हूँ।
स्वरचित और मौलिक
विवेक अग्रवाल
Tue, 22 Feb 2022 - 04min - 39 - एहसास-ए-मोहब्बत (Ehsas-A-Mohabbat)
एहसास-ए- मोहब्बत हर रोंया गुदगुदाता है।
तन्हाई में भी मुस्कान के मोती सजाता है।
चंद तारीखों में न सीमित कर मोहब्बत को।
ये जज़्बा हर लम्हे में पैबस्त हुआ जाता है।
इश्क़ फैले तो पूरी कायनात में न समाये।
और चाहे तो छोटे से दिल में सिमट आता है।
जिसने की; करामात-ए-मोहब्बत वही जाने।
की कैसे ये एक साथ हँसाता और रुलाता है।
न रहे बाकी कोई और ख्वाहिश इस दिल में।
दौलत-ए-इश्क़ हो तो न कुछ और लुभाता है।
महक उठता है चमन खिल उठती हैं फ़िज़ायें।
महबूब हो साथ तो समाँ संग संग गुनगुनाता है।
दुआ करो की कभी कोई आशिक न बिछड़े।
जुदाई का सिर्फ ख्याल ही कितना तड़पाता है।
कामयाब हो या न हो तू एक बार करके देख।
मोहब्बत का तजुर्बा भी बहुत कुछ सिखाता है।
पाकीज़ा है वो दिल जिसमें मोहब्बत होती है।
यूँ ही नहीं इश्क़ खुदा का साया कहलाता है।
स्वरचित और मौलिक
विवेक अग्रवाल
Write 2 me on HindiPoemsByVivek@gmail.com
Sun, 13 Feb 2022 - 04min - 38 - ग़ज़ल - इतनी मेरी कहानी (Ghazal - Itni Meri Kahani)
नखरे तिरे उठाये, तिरि बात हम ने मानी।
तिरा इंतज़ार करते, मिरि खो गयी जवानी।
तुम दूर हम से हो तो, कमतर है जिंदगानी।
दिन भी नहीं है अच्छा, न ही रात है सुहानी।
तुम आज हो ये कहते, कहीं और दिल लगा लूँ।
अब यूँ किसे मैं चाहूँ, न तिरा बना है सानी।
अहसान कर दे इतना, कि न याद हम को करना।
यदि कोइ रह गयी है, मिरि फेंक दे निशानी।
शुरुआत भी तुझी से, अनजाम तुम हो मेरा।
कुछ और ना है शामिल, इतनी मेरी कहानी।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
स्वरचित व मौलिक
Write 2 me onHindiPoemsByVivek@gmail.com
Sun, 30 Jan 2022 - 07min - 37 - अपना बीता साल (Apna Beeta Saal)
अपना बीता साल
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
हर्ष के लमहे भी देखे,
और देखा दुःख का काल।
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
आरम्भ था वो साल का,
कहूँ क्या अपने हाल का।
निष्क्रिय निर्जीव था,
न होश समय की चाल का।
एक गीत बन के आयी थी,
उमंग साथ लायी थी।
मुझे सोते से जगा दिया,
दिल पे वो ही छायी थी।
सच कहें तो यूँ लगा,
आया कोई भूचाल।
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
दीप में ज्यूँ घृत पड़ा,
उठ के मैं हुआ खड़ा।
हार मान चुका था जो,
वो शक्ति से पूरी लड़ा।
भावों को एकत्र किया,
शब्दों में पिरो लिया।
घिसट रहा था पहले जो,
अब वही जीवन जिया।
बस यही समझ लो,
कि हो गया कमाल,
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
पुष्प कहीं खिलने लगे,
हिंडोले से हिलने लगे।
मुस्कान लौट आयी थी,
मित्र नये मिलने लगे।
नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
कानों में नये राग बजे।
हर्ष का सूर्य निकल आया,
विषाद की छाया तजे।
लगा जोर का धक्का और,
बदली समय की चाल।
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
पर बात कुछ जमी नहीं,
ख़ुशी की बेला थमी नहीं।
ना जाने किसकी लगी नज़र,
जलने वालों की कमी नहीं।
हमें अकेला छोड़ के,
दिल हमारा तोड़ के।
बस यूँ ही वो चली गयी,
क़दमों को अपने मोड़ के।
साथ सब चला गया,
बस रह गए सवाल।
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
आज तक इस बात का,
दिल में है मलाल।
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
नभ की ऊँचाई देखी,
फिर देखा पाताल।
बहुत कुछ दिखा गया,
अपना बीता साल।
क्या बतायें कैसा गुजरा,
अपना बीता साल।
स्वरचित और मौलिक
विवेक अग्रवाल
Write 2 me onHindiPoemsByVivek@gmail.com
Mon, 24 Jan 2022 - 04min - 36 - हिन्द की सेना (Indian Army)
हिमालय की बर्फीली ऊँचाइयों से, हिन्द महासागर की अथाह गहराइयों तक।
पूर्वोत्तर के प्रचंड झंझावतों व सघन वर्षा वनों से, थार की गर्म शुष्क हवाओं तक।
हिंदुस्तान के कोने कोने में आलोकित है, इनके स्वेद और शोणित की चमक।
और अनंत काल तक गूँजेगी, सेना-ए-हिन्द की जोशीली ललकारो की खनक।
माँ भारती की सीमा-औ-सम्मान-सुरक्षा पर, ये सदैव शीश अर्पण को तत्पर।
कभी मुड़े ना कभी रुके ना कभी डरे ना, जब जब आया बलिदान का अवसर।
आशंकित हृदय से करते हैं प्रतीक्षा, इनके घर पर भी इनके प्यारे परिजन।
पर विशाल वज्र वक्ष विस्तृत है इतना की, हर भारतवासी है इनका स्वजन।
पर क्यों कर इनके बलिदान के किस्से, हम याद करते हैं बस एक दो दिन।
देश प्रेम एक निरंतर बहती नदिया है, यदि ये भूले तो आजादी जायेगी छिन।
मेरी प्रार्थना पर गौर करो मेरे देशवासियों, अगर चाहते हो सच्ची श्रद्धांजलि देना।
तो निज कर्तव्य की करो पूर्ति निष्ठा से यूँ, कि नाज हम पे करे ये हिन्द की सेना।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
स्वरचित व मौलिक
Write 2 me onHindiPoemsByVivek@gmail.com
Sat, 15 Jan 2022 - 03min - 35 - बातें दिल की (Baaten Dil Ki)
एक ग़ज़ल लिखी है चन्दा पे,
छत पर आके पढ़ लेना।
है तेरी याद में गाया नगमा,
जब हवा बहे तो सुन लेना।
अपने सागर में उगते सूरज को,
नयन घटों से अर्घ्य दिया है।
तेरे सागर में जब सूरज डूबे,
अश्कों के मोती चुन लेना।
जितनी भी हैं मेरी यादें,
दो हिस्सों में कर लेना।
बुरी लगें जो उन्हें भुलाकर,
ठीक लगें वो रख लेना।
जो दुनिया वाले पूछें तुझसे,
किसने की थी बेवफ़ायी।
तुमको है ये कसम हमारी,
नाम मेरा तुम कह लेना।
अपने जीवन से रंग चुराकर,
इंद्रधनुष ये खींच दिया है।
लेकर धागे आसमान से,
ख्वाब नये तुम बुन लेना।
नये साल की ये अभिलाषा,
एक आखरी सौदा हो जाये।
अपने सारे ग़म मुझे देकर,
खुशियाँ मेरी तुम ले लेना।
स्वरचित और मौलिक
विवेक अग्रवाल
Fri, 07 Jan 2022 - 04min - 34 - जन जन को जगाते हैं
चलो इस जनवरी जन जन को जगाते हैं। बैर और नफरत की दीवार को, मिलकर मिटटी में मिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। व्यर्थ का यह वाद विवाद, इसका प्रत्युत्तर उसका प्रतिवाद, पूर्वाग्रहों को मन से हटा, सब लोग करें सार्थक संवाद। तुम अपनी कहो, हम अपनी सुनाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। व्यक्ति को है जब गुस्सा आता। विवेक कहीं है तब खो जाता। अपशब्द अनर्गल प्रलाप करे वो, मगर बाद में वो है पछताता। क्रोध में कहा सुना, साथ मिलकर भुलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। चाहे दिन हो या हो रातें, सुनने में आतीं कड़वी बातें, क्या करना कटुता से हमको, गिनती की जब हैं मुलाकातें। क्यूँ ना वाणी में गुड़ की, मिठास मिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। वही चैन की नींद है सोता, जो मोती रिश्तों के पिरोता, तर्क जीतना बहुत सरल है, दिल जीतना मुश्किल होता। अपने आहत मित्रों को प्रेम से मनाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। प्रभु सत्य मार्ग हमको दिखलाना, सबक सही सबको सिखलाना, याद रहे कभी भूल न पायें, बात खरी मन में लिखलाना। आँखों पर चढ़ा, शक़ का चश्मा हटाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। आसान बहुत है मार्ग बताना, कठिन मगर स्वयं चल पाना, जैसा चाहो व्यवहार सभी से, वैसे पहले खुद करके जाना। दूसरों से पहले, आज स्वयं को समझाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। हो बलवान या हो कमजोर, नरम हृदय हों न बनें कठोर, टूटी नहीं पर उलझ गयी है, सबको जोड़े जो नेह की डोर। दिल के उलझे धागों को फिर से सुलझाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। भारत देश है गौरव अपना, क्यूँ न हो ये सबका सपना, भूख रहे न रोग रहे यहाँ, किसी को कभी न पड़े तड़पना। मिल कर संवेदना का, मरहम लगाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। इस भूमि का इतिहास महान, राम कृष्ण का कर ले ध्यान, वीरों के शोणित से सिंचित है, मातृभूमि पर हो हमको अभिमान। गौरवपूर्ण गाथाओं को, पुनः याद दिलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। ये जीवन है बस एक बसेरा, सब उसका न तेरा न मेरा, सोचने वाली बात है आखिर, छोड़ रोशनी क्यों चुने अँधेरा। स्नेहघृत व विश्वास-बाती से, सत्य-दीप जलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। है शाश्वत सत्य सनातन धर्म, आज समझ लो इसका मर्म, अपनी पीड़ा तो सबको दुःख देती, पर पीड़ा हरना ही सर्वोत्तम कर्म। गीता हो या ग्रन्थ गुरु का, सब यही बतलाते हैं। चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं। स्वरचित और मौलिक विवेक अग्रवाल
Fri, 31 Dec 2021 - 05min - 33 - मेरी तन्हाई (Meri Tanhai)
मेरी तन्हाई वाकिफ है मेरे हर एक राज से।
आखिर मेरी सबसे वफादार हमराह है ये।
खुशियों की बज़्म में भले ही न हो शामिल।
गम में बहे हर एक अश्क की गवाह है ये।
छोड़ देती है मेरा साथ जब तू पास होती है।
पर जुदाई में गुलशुदा दिल की पनाह है ये।
हमसफ़र बदल लेते हैं अपनी राहें अक्सर।
जब और रास्ते बंद हों तो अकेली राह है ये।
अफ़सुर्दा दिल जब महव-ए-यास रहता है।
तस्सवुर में तेरे तबस्सुम से भरी चाह है ये।
लोग साथ छोड़ देते हैं यूँ छोटी सी बात पर।
नाशाद जीस्त को सुकूँ देती आरामगाह है ये।
नाकाम इश्क़ पे दुनिया अक्सर हँसा करती है।
आशिक के ग़मों से इख़लास रखती आह है ये।
दिल तोड़ने से बड़ा गुनाह तो कुछ और नहीं।
गुनहगारों की दुनिया में अकेली बेगुनाह है ये।
मेरी तन्हाई के अल्ताफ़ का हिसाब ही नहीं।
असली इश्क़ करती बे-ग़रज़ बे-पनाह है ये।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
स्वरचित व मौलिक
Thu, 23 Dec 2021 - 04min - 32 - परोपकार (Paropkar)
क्या वृक्षों को तुमने देखा है,
निज फलों का स्वयं संचय करते।
वाटिका में पल्लवित पुष्प भला,
क्या मात्र अपने लिये महकते।
जनकल्याण को आतुर अम्बुद,
क्यों अपना अस्तित्व मिटाता।
सूर्य देव के सप्त अश्वों को,
दिन भर क्यों कर अरुण चलाता।
नभ में टिमटिमा के ध्रुव तारा,
पथिकों को है दिशा दिखाता।
अपने कद को काँटछाँट कर,
चन्दा है सबको तिथि बताता।
आखिर अपना क्या प्रयोजन,
जो अवनि भोजन सबको देती।
जग में श्वासों का संचार करके,
वायु क्या प्रतिदान है लेती।
स्व-सदन त्याग निकल पड़ी,
सोचो ये सरिता किसके लिये।
स्वयं जल कर भी प्रकाश बाँटते,
किसको ये छोटे से दिये।
उर-पीड़ा निर्मित मोती से,
सीपी कब करती निज श्रृंगार।
बहुमूल्य रत्नों पर रत्नगर्भा ने,
कब माँगा कोई अधिकार।
कुहुकिनी के कंठ की कूकेँ,
किसको अपने गीत सुनाती।
निश दिन श्रम कर मधुमक्षिका,
मधु किसके लिये बनाती।
निज प्राण सहर्ष त्याग दधीचि ने,
अस्थि वज्र प्रदान किया।
शरणागत धर्म निभाने शिवि ने,
शरीर श्येन को दान दिया।
समुद्र-मंथन से निकले विष को,
क्यों महादेव ने पी डाला।
सात दिनों तक कनिष्ठा पर,
क्यों गोवर्धन उठाये गोपाला।
परोपकार के कार्य हैं ये सारे,
किसी का किंचित स्वार्थ नहीं।
वो जीवन भी कोई जीवन है,
जिसमें तनिक भी परमार्थ नहीं।
प्रकृति हमको नित्य दिखलाती,
बिना स्वार्थ के करो कर्म।
महापुरुष भी यही सिखाते,
परोपकार ही है सर्वोत्तम धर्म।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
स्वरचित व मौलिक
Mon, 20 Dec 2021 - 03min - 31 - अपने सपने
अपने सपने ऐ मुन्ने तू मुझे बता, तेरे क्या क्या सपने हैं कौन से हैं औरों ने चुने, और कौन से तेरे अपने हैं। कदम कदम पर लोग कहेंगे, क्या करना है क्या नहीं। इधर उधर की राह पकड़कर, भटक न जाना तू कहीं। बाकी सबकी बातें छोड़, बात तू अपने दिल की सुन। तेरी मंज़िल जो रस्ता जाये, राह वही तू खुद से चुन। मछली को तुमने देखा है, क्या कभी पेड़ पर चढ़ते। या किसी बाज को तुमने पाया, कभी ऊँचाई से डरते। सबके अपने गुण दोष हैं, अपनी अपनी है शक्ति। प्रभु ने सबको कुछ ख़ास दिया, भिन्न है हर व्यक्ति। ना कर किसी से तुलना तू, मार्ग तेरा व गति भी तेरी। आशादीप जलाके रखना, मिले अगर कोई गली अँधेरी। बाधायें तो आयेंगी लेकिन, मन में होगा पूरा संतोष। स्वयं चुना था मार्ग अपना, नहीं किसी का कोई दोष। अगर पकड़ के राह दूसरी, है मंजिल मिल भी जाती। एक खालीपन रह जाता है, ना खुशी है सच्ची आती। एक जिंदगी मिलती सबको, क्यों इसको बर्बाद करें। अपने अनुसार जी लें इसको, व्यर्थ का क्यूँ विवाद करें। जिंदगी अगर एक चित्र है, तो तुझे ही इसे बनाना है। रंग जो लगते तुझको प्यारे, उनसे ही इसे सजाना है। ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित) स्वरचित व मौलिक
Sat, 04 Dec 2021 - 03min - 30 - निर्झरिणी
निर्झरिणी
निर्मल निश्छल निर्झरिणी तू, पर्वत पर प्रपात बन बहती।
मनमोहक मधुर मंद ध्वनि में, मेरे कानों में क्या कहती।
स्वच्छंद सजीव तू चले निरंतर, थमना है तेरा काम नहीं।
पथ पर पड़ते पाषाण परन्तु, प्रीती सदैव हृदय में रहती। (१)
अंजन आँखों से तेरी चुराकर, श्यामघटा है नभ में छाती।
तेरी तरंगों से क्रीड़ा करने, नित्य सूर्य की किरणें आती।
उमड़ घुमड़ तेरा नृत्य देखके, पशु-पक्षी हैं साथ थिरकते।
प्रमुदित प्रफुल्लित प्रकृति भी, गीत तेरे स्वागत में गाती। (२)
सुरभित साँसों से सौरभ ले, हैं कानन की कलियाँ महकीं।
कल-कल कलरव तेरा सुनके, चपल चंचल चिड़ियाँ चहकीं।
दमक दृष्टि-दीप्ति से तेरी ही, ये खद्योत अरण्य के पाते हैं।
स्वच्छ सलिल की मदिरा पीके, मदहोश मधुलिकायें बहकीं। (३)
अवदात अम्बु के दर्पण में, प्रतिबिम्ब देखके मृग मुस्काते।
सानिध्य तेरा पाने को, उत्तंग शिखर-गज झुक-झुक जाते।
धन्य हुआ है जीवन मेरा, मुझको जो अविरल साथ मिला।
हृदय में उठतीं प्रेम-तरंगे, मीलित नेत्र नित्य स्वप्न सजाते। (४)
स्नेह सदैव संचित रखना, जीवन को इससे आधार मिला।
कभी कुम्हलाये नहीं हिय का, जो पावन प्रेम-पुष्प खिला।
आरोह-अवरोह आयेंगे जीवन में, नेह कभी न मिटने पाये।
अनुराग-अनल जो बुझी कभी तो, बन जायेगी हिमशिला। (५)
स्वरचित और मौलिक
विवेक अग्रवालThu, 02 Dec 2021 - 03min - 29 - ग़ज़ल-लहजा (Ghazal - Lehja)
ग़ज़ल-लहजा
मतलब निकल गया तो, लहजा बदल गया।
चलो इस बहाने हमें दिख, चेहरा असल गया।
कल की बात है वो, दर आये मुस्कुराते।
देख कर भोली सूरत दिल, अपना मचल गया।
ऐसा नहीं हमें ना था, तग़ाफ़ुल का अंदेशा।
कुछ ऐसे वो बोले कि, जादू सा चल गया।
कतराते हैं वो ऐसे की मेरा, साया तक ना दिखे।
जिनकी फ़रमाइश पे कुर्बां, मेरा कल गया।
उसके लबों पे है हँसीं, पा के मेरी नियामत।
अपने लबों पे बस रह, एक ग़ज़ल गया।
लेखन - विवेक अग्रवाल संगीत और गायकी - रणधीर सिंहMon, 08 Nov 2021 - 05min - 28 - तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से - साहिर लुधियानवी
तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो क़हक़हे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
छुपा-छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गयी हो तुममेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो
उम्मीद क्या है बस एक पेशो-ओ-पश है कुछ भी नहीं
मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो
ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाईयों पर रहम करो
वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं
मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो
मेरी फ़ना मेरे एहसास का तक़ाज़ा है
मैं न जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है
शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है
मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
खफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर
तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम
मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो
हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो
मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ
मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता
ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के तले
हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा
हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर
हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका
ये करख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा
ये शरहों पे रंगीन साड़िओं की झलक
ये झोँपड़ियों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशें
ये माल रोड पे कारों की रैल पैल का शोर
ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे
गली गली में बिकते हुए जवाँ चेहरे
हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छायी हुई
ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ
खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी
ये बात बात पे कानून और ज़ब्ते की गिरफ़्त
ये ज़ीस्क़ ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
ये ग़म हैं बहोत मेरी ज़िंदगी मिटाने को
उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो- साहिर लुधियानवी
Sun, 07 Nov 2021 - 04min - 27 - शक्ति-स्वरुप
प्रथम सर्ग
काँप रही थी पृथ्वी, स्वर्ग भी था भयभीत।
महिषासुर ने लिया, तीनों लोकों को जीत।
त्राहि माम के गुंजन से, सृष्टि भर गयी सारी।
जग में आतंक मचा रहा, वो क्रूर अत्याचारी।
उसकी शक्ति के सम्मुख, देव भी थे लाचार।
ब्रह्मदेव के वर स्वरुप, निष्फल हुये प्रहार।
वज्र व्यर्थ बाण बेकार, सुदर्शन सफल नहीं।
देवता घूम रहे चहुँ ओर, मिले न चैन कहीं।
थक हार कर सब पहुँचे, महादेव के पास।
निराश हृदय में लेकर, एक छोटी सी आस।
त्रिलोक नाश का सामर्थ्य, रखते हैं त्रिपुरारी।
महिषासुर के सम्मुख, उनकी शक्ति भी हारी।
देख दृश्य दुष्कर, सबका क्रोध उमड़ आया।
कौंधी बिजली ऐसे, काँप उठी अवनि काया।
देवों के मस्तक से तब, तेज पुंज प्रकट हुआ।
कोटि कण अग्नि मिल, वडवानल प्रचंड हुआ।
सहस्त्र सूर्यों का प्रकाश, समस्त विश्व में छाया।
प्रकाशपुंज मध्य में स्थित, तेज भरी एक काया।
दिव्य दर्शन देवी के ऐसे, नेत्र नहीं टिक पाते।
शक्ति का अनुभव ऐसा, हाथ स्वयं जुड़ जाते।
श्रीविष्णु बोले यह, साकार रूप है शक्ति का।
समझो जैसे उत्तर है, निज संकट व भक्ति का।
सुन प्रभु की ऐसी वाणी, ऊर्जा का संचार हुआ।
शिथिल शरीरों में, नवशक्ति का विस्तार हुआ।
सब देवों ने देवी को, किये अस्त्र शस्त्र प्रदान।
देवी ने उग्र हुंकार भरी, ले जग पीड़ा संज्ञान।
माँ मुक्ति दो अत्याचार से, करो उद्धार हमारा।
भक्तों की व्यथा सुन माँ ने, दैत्य को ललकारा।
दहले दानव दल देख, कात्यायनी का रौद्ररूप।
महिषासुर भी भयभीत हुआ, देख शक्ति स्वरुप।
भीषण युद्ध छिड़ गया, दोनों ने किये प्रहार।
अंततः माता ने कर दिया, महिषासुर संहार।
ऋषियों ने माँ वंदन को, सुन्दर श्लोक बनाये।
गृहस्थों ने माता सम्मुख, स्वादिष्ट भोग चढ़ाये।
हर्षित हुये देव व मानव, स्वतंत्र हुआ जग सारा।
भक्ति में सब डूब लगाते, माँ का जयजयकारा।
द्वितीय सर्ग
इस तरह जगराते में हुयी, माँ की कथा समाप्त।
अच्छाई की जीत देख, हुआ हिय को हर्ष प्राप्त।
अपना उद्धार कब होगा, यही सोचता घर आया।
जग पर अब भी मंडराता, महिषासुर का साया।
दुर्बल-निर्धन आज भी सहते, अगणित अत्याचार।
कौन करेगा अपराधियों का, फिर समूल संहार।
इनके पास भी है कवच, ऊपर से वरदानों का।
इसीलिए होता निरर्थक, हर अस्त्र कानूनों का।
माँ मेरी विनती तुमसे, कुछ तो राह दिखाओ।
कैसे न्याय करें स्थापित, कोई उपाय बताओ।
रक्तबीज सदृश इनकी, संख्या बढ़ती जाती।
दीन दुखी दुनिया बचाने, क्यों नहीं तू आती।
यही प्रार्थना हृदय बसाये, जाने कब सो गया।
स्वप्न में माता प्रकट हुईं, ऐसी मुझपे की दया।
मंद मंद मुस्काते, ममता से मस्तक सहलाया।
बोलीं कथा से मेरी, क्या इतना समझ न आया।
शक्ति का मूल क्या है, क्या है सत्य स्वरुप।
किस श्रोत से प्रकट है होती, शक्ति ये अनूप।
क्या कभी सोचा तुमने, क्यों ऐसा हाल तुम्हारा।
क्यूँ मुट्ठी भर लोगों से, आतंकित ये जग सारा।
याद कर मेरे रूप का, श्रोत था सबका क्रोध।
मैं तुम सबमें सन्निहित, कर लो इसका बोध।
न्याय तुम्हें मिल जायेगा, जब तुम ये जानोगे।
स्वयं में स्थित शक्ति को, स्वयं ही पहचानोगे।
अनाद्यनन्त है प्रकृति मेरी, न निज एक स्थान।
सामूहिक शक्ति हूँ मैं, करो मिल के आव्हान।
जो जग में परिवर्तन चाहो, करो स्वयं शुरुआत।
मर्म मेरी कथा का जानो, इतनी छोटी सी बात।
माता वचनों को सुनके, दूर हुआ सब संशय।
एकता में शक्ति इतनी, निश्चित है अपनी जय।
सन्देश यही फैलाना है, प्रण लेता हूँ मैं आज।
अपनी शक्ति से ही सार्थक, अपने सारे काज।
हे देवी तुझे नमन जो, स्थित है शक्ति रूप में।
सर्वव्यापी कालजयी, वर्तमान भविष्य भूत में।
हे देवी तुझे नमन जो, स्थित है बुद्धि रूप में।
मन मानस में मेरे बसती, ज्ञान के स्वरुप में।
- विवेक
(स्वरचित और मौलिक)
Fri, 15 Oct 2021 - 07min - 26 - क्राँति का नया अर्थ
शीर्षक: क्राँति का नया अर्थ
२६ जनवरी की सर्द सुबह को, गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुये।
गर्वित अनुभव कर रहा था, टीवी पर सेना की परेड देखते हुये।
की अचानक एक आवाज आयी, और लुप्त हो गयी पिक्चर सारी।
तथा स्क्रीन पर आ गए भगत, सुभाष और अन्य वीर क्रांतिकारी।
चेहरे पर स्वतंत्रता मिलने का हर्ष नहीं, अपितु था एक विचित्र विषाद।
रक्तिम नेत्रों में निराशा-नीर, व आक्रोश-अग्नि का मिश्रित उन्माद।
विस्मय और भय के बीच डोलता हुआ, एक पुतले सा था मैं स्तब्ध।
तभी गूँज उठे मेरे पूरे घर में, उन वीरों के रोष भरे ओजस्वी शब्द।
लाल किले पर निज ध्वज लहराये, हमने था जीवन उद्देश्य बनाया।
उसी किले पर अपने ध्वज का फिर, कैसे क्यों तुमने सम्मान घटाया।
इस भारत की आजादी हेतु हमने, प्राणों को भी था दाँव पर लगाया।
उसी आज़ादी का ऐसा दुरूपयोग देख, आज लज्जा से सर झुकाया।
जब देखो तब हड़तालें करके, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हो।
भारतवासियों के खून पसीने से बनी, राष्ट्र सम्पति को सरेआम जलाते हो।
विश्वविद्यालयों में एकत्र हो कर, भारत तेरे टुकड़े होंगे, ऐसा चिल्लाते हो।
और तद्पश्चात ऐसे घृणित नारों को अभिव्यक्ति की आजादी बताते हो।
मूर्खों वो समय कुछ और था, अब समय की है और पुकार।
स्वतंत्र राष्ट्र है लोकतंत्र है, सबको है मत का पूरा अधिकार।
अब जनता ही जनार्दन है, चुनती है स्वयं वो अपनी सरकार।
स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं, सत्य करो तुम ये स्वीकार।
उस समय थी बस एक चुनौती, भारत को कैसे स्वतंत्र करायें।
इस वक़्त में है अब नये लक्ष्य, निज राष्ट्र को कैसे और बढ़ायें।
क्राँति का अर्थ है बदल गया, अब हिंसा का नहीं यहाँ स्थान।
नए युग के नए मोर्चे हैं अब, जैसे शिक्षा, उद्योग, और विज्ञान।
सुनकर उन सबकी ऐसी बातें, नयनों में नीर छलक आया।
दृगजल से प्रक्षालित मन में, ज्ञान का एक नव दीप जलाया।
प्यारे देश वासियों सुन लो, वीर क्रांतिकारियों का ये सन्देश।
बंद कर दो ये व्यर्थ तमाशा, ख़त्म करो कटु कलह कलेश।
कभी इनके बलिदानों से न, ऋणमुक्त हम सब हो पायेंगे।
कोटि कोटि कृतज्ञ कंठ यहाँ, गीत भला कितने ही गायेंगे।
नहीं होगी पर्याप्त हम सबकी, भावुक शब्दों की पुष्पांजलि।
हम भी जब देश निर्माण करें, तभी पूर्ण होगी ये श्रद्धांजलि।
स्वरचित व मौलिक
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Write 2 me onHindiPoemsByVivek@gmail.com
Sun, 10 Oct 2021 - 05min - 25 - कोपल की कहानी
कोपल की कहानी
कोमल कोपल के कोने से,
ढुलक पड़ी बूँदें ओस की।
सकुचाई सिमटी सी वो पत्ती,
कर अर्पित निधि कोष की।
अंशुमाली क्या स्वीकार करेंगे,
सप्रेम समर्पित स्नेह अर्घ्य यह।
धरा ने जिसे धरा सहेज कर,
कहीं किधर न जाये बह।
अवनि आखिर जननी है,
पादप, पत्ती पुष्पों की।
कैसे जाने दे व्यर्थ भला,
प्रेम-भेंट निज पुत्री की।
बहुत हुआ ये तिरस्कार,
मन ही मन वसुधा ने ठाना।
क्या अपराध किया कोपल ने,
होगा सूर्य को आज बताना।
पूछा प्रश्न भूमि ने भानु से,
क्यूँ किरणें कोपल से कतराती।
स्नेह-रहित क्यूँ दुहिता उसकी,
प्रिय प्रेम से वंचित रह जाती।
उत्तर दिया सूर्य ने सकुचाते,
मैं तो प्रतिदिन यहाँ आता हूँ।
विशाल वटवृक्ष के साये में,
कोपल को सोते पाता हूँ।
कैसे किरणें कोपल को चूमें,
जब मध्य हमारे वट की काया।
सम्पूर्ण समर्पण से संभव है,
हट जाये ये काली छाया।
सन्देश उसे तुम दे दो मेरा,
परिपक्व उसे बनना होगा।
मेरे स्नेह की किरणों को पाने,
अस्तित्व स्वतंत्र करना होगा।
मेरे स्वभाव में भेद नहीं है,
मुझे पक्षपात न आता है।
जिसने जितना जतन किया,
उतना स्नेह वो पाता है।
बिसरी बातों में खोने से,
नव निर्माण नहीं होता।
वही नया फल पाता है,
जो प्रयास-बीज बोता।
प्रभु प्रदत्त वर है ये जीवन,
इसको न ऐसे व्यर्थ करो।
नया उद्देश्य बना कर अपना,
आगे ही आगे कदम धरो।
~ विवेक अग्रवाल
(स्वरचित, मौलिक)
Mon, 27 Sep 2021 - 04min - 24 - अपना ये रिश्ता
अपना ये रिश्ता
न अपनों वाली आत्मीयता है और,
न अजनबियों वाली औपचारिकता।
असहज हो जाती हो मेरी मौजूदगी में,
आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर …
न कभी अनुराग से मनुहार किया और,
न ही कभी नम्रता से परिपूर्ण निवेदन।
चंद लफ़्ज़ों में कर लेती हो जरुरत की बात,
आखिर कहाँ सीखी ये व्यवहार कुशलता। आखिर …
न दिखी कभी स्नेहमयी सहज संवेदना और,
न ही कभी शिष्टाचार की कृत्रिम कृतज्ञता।
फिर भी रोज होती हैं अपनी बातें दो चार,
आखिर क्या है इस संवाद की विवशता। आखिर …
न कभी देखता हूँ बेबाक बिंदास ठहाके और,
न ही लिपस्टिक सी चिपकी नकली मुस्कान।
बस शून्य में कुछ ढूंढता एक भावहीन चेहरा,
आखिर क्यों लुप्त हो जाती है चपलता। आखिर …
न कभी मेरे कंधे पर सिर रख रोती हो, और
न ही गम छिपा कहती हो की सब ठीक है।
झिझकती हो जब आँसू पोंछने हाथ बढ़ाता हूँ,
आखिर कौन दुःख है जो दिल में कसकता। आखिर …
न कभी मुझसे मन की बात कहती हो, और
न ही कभी कुछ अनर्गल बोल छिपाती हो।
कैसे जानूँ मैं जो वाकई तेरे दिल में है,
आखिर इंसान हूँ मैं न की कोई फरिश्ता। आखिर …
बहुत देखा है अपनों को अजनबी बनते।
और अजनबियों से बनते नाता अपना।
पर ये जो है ना अपना और ना बेगाना।
आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर …
स्वरचित व मौलिक
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Fri, 10 Sep 2021 - 03min - 23 - साढ़े नौ किलोमीटर (Nine and a half Kilometers)
साढ़े नौ किलोमीटर "साढ़े नौ किलोमीटर" कलाई पर बँधी स्मार्टवॉच ने दिखाया। जैसे ही घर का द्वार निकट आया। रोज ही की तरह मॉर्निंग वॉक से वापस आ रहा था। स्वयं से किया नये साल का वादा निभा रहा था। अपनी जानी पहचानी गलियों को मापते हुये। पास वाले गार्डन और बीचफ़्रंट की लम्बाई नापते हुये। तक़रीबन डेढ़ घंटा हो गया था चलते हुये। और अपनी प्रिय प्लेलिस्ट को सुनते हुये। ऑफिस के पेंडिंग काम याद आने लगे थे। और सिर्फ घंटा भर पहले सोचे, कविता के खूबसूरत आइडियाज दिमाग से जाने लगे थे। साढ़े नौ किलोमीटर, ये बात नहीं थी नयी या विशेष। अक्सर घर आ जाता था, जब दस किलोमीटर में होते थे कुछ मीटर शेष। ऐसे में मैं थोड़ा और आगे चला जाता था। और यू टर्न ले कर वापस घर आता था। अपने दस किलोमीटर पूरा करने का संतोष पाने। और फिर स्क्रीनशॉट को फेसबुक पर डाल सबको बताने। ऐसे विषम, अजीब आंकड़े पर भला कौन इतिश्री करेगा। और न ही कुछ मिनट और चल लेने से कुछ बिगड़ेगा। कई बार तो समय के अभाव में ऐसा भी था किया। कि कूल डाउन मोड छोड़ कर एक स्प्रिंट मार दिया। "साढ़े नौ किलोमीटर" एक बार फिर स्मार्टवॉच की रीडिंग को देखा। और एक गहरी साँस ले पार कर ली गृहरेखा। समय था, स्टैमिना भी था फिर भी आगे न कदम बढ़ाये। बिना दस किलोमीटर पूरे किये, वापस घर के अंदर आये। सोचा क्या फर्क पड़ता है यदि आधा किलोमीटर कम चला। ये राउंड नंबर की मृगतृष्णा एक मोह ही तो है जिसे छोड़ना भला। मुख्य बात है नित्य सुबह उठ, अपनी वॉक पे जाना। खुली हवा में साँसे ले गहरी, आगे कदम बढ़ाना। अभी कुछ ही दिन पहले “गीता इन 18 डेज” नाम की पुस्तक पढ़ी थी। और लेखकजी से प्रेरणा ले कर, निष्काम कर्म की थोड़ी धुन तो चढ़ी थी। साढ़े नौ किलोमीटर आज की इस वॉक ने सबसे जरुरी लाइफ लैसन पुनः याद दिला दिया। और मेरे अंदर का मैं जो कहीं खो सा गया था आज मुझसे फिर मिला दिया। अब निगाह घडी घडी स्मार्टवॉच पर टाइम, डिस्टेंस, पेस, देखने ना जायेगी। पत्तों पुष्पों से ढुलकती ओस की बूंदों को नयन घट में ले उगते सूर्य को अर्घ्य चढ़ायेगी। अब कानों पर हैडफ़ोन लगा, उच्च स्वर में तीव्र गति का संगीत सुन स्वयं को पृथक ना करूँगा। सिंधु की मचलती लहरों, चिड़ियों के कलरव और लाफ्टर क्लबके बिंदास ठहाकों को सुनूँगा। बस बहुत हुआ निन्यानवे का फेर, अब ना किसी रैट रेस में भागूँगा। कर्म करूंगा पूरे प्रयास से पर, रिजल्ट को प्रभु प्रसाद ही मानूँगा। यूँ तो कई बार मैंने हाफ मैराथन का डिस्टेंस भी तय किया था। पर आज अधूरी अपूर्ण मॉर्निंग वॉक ने मुझे सम्पूर्ण कर दिया था। जो खोज रहा था पूरी दुनिया में मिल गया अपने ही भीतर। थैंक यू, साढ़े नौ किलोमीटर। ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Thu, 02 Sep 2021 - 04min - 22 - सन्देश (Message)
सन्देश
साँवरे सुन सन्देश हृदय का, मोहे मोह माया से उबार दे।
अपने चरणों की पावन रज पै, थोड़ा सा तो अधिकार दे।
मन मोरा मैला मलिन जान के, न छोड़ना मेरा साथ मुरारी।
मेरी भक्ति को अपनी शक्ति का, अवलंब और आधार दे।
बांके बिहारी बसि बसि जावे, छवि तिहारी मोरे नैनन में।
देखूँ हर पल तोरी मोहिनी मूरत, पूरा कर मोरा मनुहार दे।
जागत सोवत बस नाम तिहारा, निकले मेरी हर श्वास से।
और कछु-कौऊ ध्यान ना आबै, हिय में अइसन प्यार दे।
काम क्रोध लोभ मोह मद मेरा, प्रभु इनका तुम नाश करो।
ज्ञान 'विवेक' भक्ति का हो बसेरा, ऐसे मुझको संस्कार दे।
- विवेक अग्रवाल (स्वरचित, मौलिक)
(जन्माष्टमी उत्सव पर मेरे इष्ट देव श्री बांके बिहारी जू के चरणों में मेरा विनती भरा सन्देश)
Sun, 29 Aug 2021 - 05min - 21 - ग़ज़ल – जिंदगी
जिंदगी की रेत से, ख़ुशी के कंकड़ छान लेते हैं।
ये जीना जीना तो नहीं, पर चलो मान लेते हैं।
तू गयी जब, तो सोचा था अब मिलेगा सुकूं।
तू नहीं तो तेरी, यादों के ख़ंजर जान लेते हैं।
नहीं चाहिये अब, हमें तेरी नज़र-ए-'इनायत।
ग़ुरूर आज भी है, हम नहीं अहसान लेते हैं।
मत करना मेरे, लौट कर आने का इंतज़ार।
पलटते नहीं कभी, एक बार जो ठान लेते हैं।
नादाँ हैं वो, जो रखते हैं वफ़ा की कोई उम्मीद।
यहाँ चंद सिक्कों में, लोग ख़रीद ईमान लेते हैं।
यदि खुश रहना है, तो सब्र रखना है बेहद ज़रुरी।
ज़िंदगी से बड़ी क़ीमत, कम्बख्त अरमान लेते हैं।
ऐ दुनिया वालों, तुमसे मुझे कोई शिकवा नहीं।
गिला अपनों से है, जान कहाँ अनजान लेते हैं।
चैन से सोने दो, जागते हुए अब थक गया हूँ मैं।
क्यूँ ये फ़रिश्ते भी, रोज़ नये इम्तिहान लेते हैं।
मत सिखाओ हमें, इस जहान के रिवाज-ओ-रस्म।
अपने खुद के 'विवेक' से, अब हम संज्ञान लेते हैं।
~ विवेक अग्रवाल
(स्वरचित, मौलिक)
Sat, 28 Aug 2021 - 04min - 20 - स्वतंत्रता दिवस विशेष - कलम के जादूगर
भारत एक विशाल राष्ट्र है और यहाँ के हर प्रान्त, शहर व ग्राम में अतुलनीय प्रतिभा के लोग निवास करते हैं पर अक्सर उनकी प्रतिभा एक उचित अवसर के अभाव में एक संकीर्ण दायरे में सिमट कर रह जाती है। हर एक व्यक्ति के पास साधन या पहुँच नहीं होती की वो एक बड़े मंच से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें।
लेकिन ये नया भारत है जो हार मान कर चुप बैठने वालों में से नहीं। ये नए नए अवसर निकाल ही लेता है। पिछले कुछ वर्षों में स्मार्टफोनों की व्यापकता और टेलीकॉम डाटा की कीमतों में भारी गिरावट से देश के कोने कोने में इंटरनेट और सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है और इससे इन प्रतिभाओं को भी अपनी कला को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के नए अवसर प्राप्त हुए हैं। पिछले दो महीने में मैं स्वयं कई अच्छे कवियों और कवियित्रों के संपर्क में आया जो छोटे नगरों या ग्रामों में रहने के बावजूद सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी श्रेष्ठ रचनाओं को पूरे देश के सामने प्रस्तुत कर प्रशंसा प्राप्त कर रहे हैं।
आज स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में मैं आपका परिचय कुछ ऐसी ही प्रतिभाओं से कराऊंगा।
---------------------------------------------------------------------------
यदि आप भी कलम के जादूगर मंच से जुड़ना चाहते हैं तो आप इन माध्यमों का प्रयोग कर सकते हैं
फेसबुक - https://www.facebook.com/groups/3338318179617111/about
यूट्यूब - https://www.youtube.com/channel/UCVhMqjaC0Z82_u606ywYJUg
Sat, 14 Aug 2021 - 23min - 19 - इश्क़ दोबारा
एक किताब सा मैं जिसमें तू कविता सी समाई है,
कुछ ऐसे ज्यूँ जिस्म में रुह रहा करती है।
मेरी जीस्त के पन्ने पन्ने में तेरी ही रानाई है,
कुछ ऐसे ज्यूँ रगों में ख़ून की धारा बहा करती है।
एक मर्तबा पहले भी तूने थी ये किताब सजाई,
लिखकर अपनी उल्फत की खूबसूरत नज़्म।
नीश-ए-फ़िराक़ से घायल हुआ मेरा जिस्मोजां,
तेरे तग़ाफ़ुल से जब उजड़ी थी ज़िंदगी की बज़्म।
सूखी नहीं है अभी सुर्ख़ स्याही से लिखी ये इबारतें,
कहीं फ़िर से मौसम-ए-बाराँ में धुल के बह ना जायें।
ए'तिमाद-ए-हम-क़दमी की छतरी को थामे रखना,
शक-ओ-शुबह के छींटे तक इस बार पड़ ना पायें।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Thu, 12 Aug 2021 - 03min - 18 - बातें बनाम कृत्य
तुम्हें पता है,
क्यूँ तुम्हारी किसी कड़वी बात का मैं बुरा नहीं मानता।
क्यूंकि बातें अक्सर अस्थायी होती हैं।
बदलती रहती हैं मनोदशा के साथ।
सिर्फ बातों का कोई खास मूल्य भी नहीं होता,
बातें करने वाले लाख मिल जायेंगे।
क्यूंकि बातें करना आसान है,
और उतना ही आसान है नकार जाना।
बातें अक्सर हवा के झोंके सी आती हैं,
और चली जाती हैं।
बस छोड़ जाती हैं एक अहसास।
जो मन को दे सकता है आह्लाद,
या विषाद,
या फिर क्रोध, ग्लानि, हताशा, चिंता, उल्लास।
कुछ भी,
पर क्षणिक।
कृत्यों की कहानी भिन्न है।
कृत्य प्रयास मांगते हैं,
इसीलिए जीवन पर अधिक असर डालते हैं।
कृत्यों का क्रय करोगे तो कीमत अधिक देनी होगी।
कृत्य हवा का झोंका नहीं,
अपितु समुद्र है।
जिसकी लहरें आती रहेंगी,
तुम्हें छूने बार बार।
कृत्यों का प्रभाव रहता है,
घटित हो जाने के काफी समय बाद भी।
कृत्य मात्र मन को नहीं प्रभावित करते,
अपितु छू जाते हैं जिंदगी को।
और कभी कभी अस्तित्व को।
तो मैं तुम्हारी बातें सुनता अवश्य हूँ,
थोड़ा प्रभावित भी होता हूँ,
पर मेरा ध्यान कृत्यों पर होता है।
और क्यूंकि कृत्यों का परिणाम हृदय है जानता,
अतः किसी कड़वी बात का बुरा नहीं मानता।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Sun, 01 Aug 2021 - 03min - 17 - माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना
माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना
ओ माँ तू मुझे सिखा दे,
आसमान में उड़ना।
पंखों में भर जोश मुझे भी,
तेज हवा से लड़ना।
हर सुबह तू छोड़ के मुझको,
दाना लेने जाती है।
सर्दी गर्मी में श्रम करके,
तू सदैव मुस्काती है।
बारिश के मौसम में जब,
नीड़ हमारा रिसता है।
वन में तू घूम अकेले,
तिनका तिनका लाती है।
तेरी प्रेरणा से मैं भी चाहूँ,
नित ऊँचाई पे चढ़ना।
ओ माँ तू मुझे सिखा दे,
आसमान में उड़ना
कभी सोचता था मैं मन में,
प्रभु ने अपना घर क्यों तोडा।
भाग्य चक्र को अपने क्यों,
विपरीत दिशा में मोड़ा।
गत जीवन के कृत्य थे,
या इस जीवन की गलती।
भरे पूरे इस सुन्दर वन में,
हमको जो एकाकी छोड़ा।
सोच सिहर जाता क्या होगा,
जो पड़ा हमें बिछुड़ना।
ओ माँ तू मुझे सिखा दे,
आसमान में उड़ना।
ऊपर वाली शाख के बच्चे,
दिन भर शोर मचाते हैं।
देख निलय में मुझे अकेला,
मिल कर खूब चिढ़ाते हैं।
अपना क्या दोष हैं इसमें,
जो अपना परिवार अधूरा।
फिर क्यों कटु शब्दों के बाण,
हम पर वो चलाते हैं।
अब तू ही मुझे बता कैसे,
उद्विग्नता में न पड़ना।
ओ माँ तू मुझे सिखा दे,
आसमान में उड़ना।
वसंतऋतू के स्वागत में जब,
सुरभित बयार है बहती।
नूतन किसलय कोपल कलियाँ,
कोने कोने में महकती।
हर्षोल्लास से उत्सव को,
सब मिल जुल कर मनाते हैं।
मुझे प्रसन्न करने हेतु तू,
कृत्रिम स्मित से चहकती।
तुझे अकेला देख स्वाभाविक,
दृग में नीर उमड़ना।
ओ माँ तू मुझे सिखा दे,
आसमान में उड़ना।
नीचे बैठा व्याध जाल ले,
बाज ऊपर मंडराता है।
इन खतरों को देख मेरा मन,
शंका से भर जाता है।
हर दिन तेरे साहस की,
एक नयी परीक्षा होती है।
पर तेरा संकल्प देख दॄढ,
संकट भी सहमा जाता है।
तुझे अकम्पित देख मैं सीखा,
पीछे कभी न मुड़ना।
ओ माँ तू मुझे सिखा दे,
आसमान में उड़ना।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Sat, 17 Jul 2021 - 03min - 16 - हिमशिला
।। हिमशिला ।।
एक निर्मल निर्झरणी थी तू,
कैसे बन गयी हिमशिला ।
किधर गयी स्नेह की गर्मी,
ये पाषाण हृदय था कहाँ मिला।
वर्षों पहले जब देखा था,
तू चंचल, कल कल बहती थी।
जोश भरी, मतवाली होकर,
लाखों बातें कहती थी।
ऐसा वेग प्रचंड था तेरा,
कोई बाधा रोक न पाती थी।
तेरी जिजीविषा के सम्मुख,
पर्वत चोटी झुक जाती थी।
निकट तेरे आकर तो मैं भी,
जड़ से चेतन हो जाता था।
तेरी लहरों के गुंजन से,
पूरा अरण्य गुनगुनाता था।
औचक हुआ दिशा परिवर्तन,
तू बह चली किसी और नगर।
कुछ दिन तो राह तकी थी मैंने,
फिर पकड़ी एक नयी डगर।
स्मृतियाँ थीं जो शेष रही,
अलग अलग जो पाँव मुड़े ।
चक्र समय का घूमा और,
जीवन में नव अध्याय जुड़े।
क्या हुआ इस अंतराल में,
जो ऊष्मा हिय की लुप्त हुई।
जीवन का पर्याय कभी थी,
अब जीने की इच्छा सुप्त हुई।
अब देख तेरा ये रूप मेरे
टीस हृदय में उठती है।
स्वच्छंद, सजीव, सतेज वो धारा,
निर्जीव, निस्तेज यूँ घुटती है।
एक समय मेरे शब्दों से,
अंतर्मन था तेरा पिघलता।
आज मेरी कविताओं से भी,
मिलती नहीं मुझे सफलता।
तूने ही तो दिया था मुझको,
अनंत वेदना का उपहार।
कहीं ये ज्वाला ही तो नहीं थी,
तेरे अस्तित्व का मुख्य आधार।
तेरी दी अग्नि को मैं अब भी,
निज हृदय बसाये रखता हूँ।
उसी पावक के साथ आज मैं,
आलिंगनबद्ध तुझे करता हूँ।
आज संतप्त हृदय अनल
ये हिमशिला पिघलायेगी।
या तेरे तुषार तमस तले,
मेरी ज्योति बुझ जायेगी।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Thu, 15 Jul 2021 - 03min - 15 - कालिदास - बाबा नागार्जुन
कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव जब भस्म हो गया रति का क्रंदन सुन आँसू से तुमने ही तो दृग धोये थे कालिदास! सच-सच बतलाना रति रोयी या तुम रोये थे? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका प्रथम दिवस आषाढ़ मास का देख गगन में श्याम घन-घटा विधुर यक्ष का मन जब उचटा खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर चित्रकूट से सुभग शिखर पर उस बेचारे ने भेजा था जिनके ही द्वारा संदेशा उन पुष्करावर्त मेघों का साथी बनकर उड़ने वाले कालिदास! सच-सच बतलाना पर पीड़ा से पूर-पूर हो थक-थककर औ' चूर-चूर हो अमल-धवल गिरि के शिखरों पर प्रियवर! तुम कब तक सोये थे? रोया यक्ष कि तुम रोये थे! कालिदास! सच-सच बतलाना! साभार - कवि नागार्जुन
Tue, 06 Jul 2021 - 03min - 14 - विवान और अवनि की प्रथम कविताSun, 04 Jul 2021 - 03min
- 13 - कविता मेरी विवशता है
।। कविता मेरी विवशता है ।।
कविता मेरा शौक नहीं,
कविता मेरी विवशता है।
जीवन के दिये जो अवसर त्यागे
उनका खेद खटकता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन पथ तो चलता जाये,
तरह तरह के मोड़ भी आये।
कुछ राहें तो स्वयं चुनी थीं,
कुछ रस्ते किस्मत से पाये।
राहें जो यूँ ही छूट गयीं,
उनका प्रतिबिम्ब झलकता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन हमको सबक सिखाये,
नित नूतन एक पाठ पढ़ाये।
कुछ सीखों को मान गये हम,
कुछ सीखों को जान ना पाये।
जिन सीखों को भूल गये अब,
उनका परिणाम पनपता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन ने कई लोग मिलाये,
कुछ अपने कुछ हुये पराये।
कुछ लोगों ने हमें संभाला,
कुछ ने बस रोड़े अटकाये।
व्यक्ति जो यूँ ही चले गये,
उनका अभाव अब खलता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन ने कई गीत सुनाये,
कुछ भावुक कुछ जोश जगाये।
कुछ को तो बस सुना था हमने,
कुछ गीत हमने भी गाये।
गीत जो हमने सुने नहीं,
उनका संगीत ही बजता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन सुख दुःख दोनों लाये,
कभी हँसाये कभी रुलाये।
कभी हर्ष से नृत्य किया तो,
कभी दर्द से आँसू आये।
क्रंदन जो अंदर रोक लिया,
उसका सैलाब उमड़ता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन ने कई प्रश्न दिखाये,
कुछ सुगम कुछ दुष्कर पाये।
कुछ प्रश्नों में सिफर मिला तो,
कुछ में अव्वल नंबर आये।
प्रश्न जो यूँ ही छोड़ दिये,
उनका जवाब अब दिखता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन ने बहुत मंच सजाये,
हमको भी कई पात्र सुझाये।
कुछ नाटकों के नायक हम थे,
कुछ में छोटा रोल निभाये।
भूमिकायें जो हमने की ही नहीं,
अब उनका अक्स उभरता है।
कविता मेरी विवशता है।
जीवन आगे बढ़ता जाये,
नये नये सम्बन्ध दिखाये।
कुछ रिश्ते तो पहले से थे,
कुछ नाते थे स्वयं बनाये।
रिश्ते जो यूँ ही टूट गये,
अब उनका दर्द कसकता है।
कविता मेरी विवशता है।
काफी कुछ किसी कारण से,
कभी मैं कह ना पाया।
और हृदय की गागर में वो,
भरता सब कुछ आया।
भरने के पश्चात घट वही,
छलक छलक छलकता है।
कविता मेरी विवशता है।
कविता मेरा शौक नहीं,
कविता मेरी विवशता है।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Fri, 02 Jul 2021 - 04min - 12 - वो काश कुछ कहकर जाती
वो काश कुछ कहकर जाती
वो काश कुछ कहकर जाती
जो मन में था होठों पर लाती
वो काश कुछ कहकर जाती
अंतर्मन में आशंका थी
या कोई मजबूरी
आखिर क्या हुआ उन दिनों
जो बढ़ गयी इतनी दूरी
जो भी था, जैसा भी था
मुझको तो बतलाती
वो काश कुछ कह कर जाती
कहने को तो कई दिनों की
थी अपनी पहचान
फिर भी एक दूजे से हम थे
काफी कुछ अनजान
थोड़ा और साथ चलते तो
समझ और हो आती
वो काश कुछ कह कर जाती
विस्मृत नहीं हुआ आज तक
वो दिन जब लम्बी राह तकी
आखिर क्या हुआ था जो वो
कहके भी आ न सकी
आने में संकोच अगर था
चिट्ठी तो भिजवाती
वो काश कुछ कह कर जाती
अनुत्तरित प्रश्नों की चुभन
दिल में है आज भी रहती
अक्सर सोचा करता हूँ मैं
उस दिन वो क्या कहती
जरा देर की बात थी आखिर
एक बार मिल जाती
वो काश कुछ कह कर जाती
वो काश कुछ कह कर जाती
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Sat, 26 Jun 2021 - 02min - 11 - मेरी जिंदगी (My Life)
बहुत समय पहले की है बात
वो थी पूनम की एक रात।
मैं था बड़े चैन से सोया
सतरंगी सपनों में खोया।
अचानक किसी ने मानसपटल खटखटाया
अलसाते हुए मन का द्वार खोला तो पाया।
काले परिधान पहने, कोई थी खड़ी
अदृश्य था चेहरा, फिर भी भयावह बड़ी।
डर और क्रोध के बीच में डोलते हुए
मैंने स्वयं को देखा ये बोलते हुए।
कौन है तू, तेरा चेहरा क्यूँ नहीं दिखता
उसने कहा, मैं हूँ तेरी जिंदगी की रिक्तता।
तू कैसे जी रहा है यही देखने आयी हूँ
जिंदगी सँवारने का अवसर भी लायी हूँ।
जीवन के सब पल जब स्याह रंग से सने हैं
तो कैसे तेरे स्वप्न सुन्दर सतरंगी बने हैं।
मैंने कहा, मेरे पास है एक स्मृतियों की तिजोरी
जिसमें सहेज रखे हैं सात रंग, की हो ना चोरी।
दिन भर नियति से लड़, जब मैं थक जाता हूँ
तब इन्हीं रंगों को देख, थोड़ा सुख चैन पाता हूँ।
वो बोली, क्या तुम चाहोगे इनको जीवन में लाना
रिक्त जिन्दगी को, खूबसूरत रंगों से सजाना।
कब तक यूँ मात्र, स्वप्नों के सहारे जियोगे
और तिरस्कार के हलाहल को, रोज पियोगे।
यदि हाँ, तो मुझे इन रंगों के बारे में बताओ
और मेरी झोली में इन्हें डाल, निश्चिन्त हो जाओ।
जब सो कर उठोगे, तो एक नयी भोर होगी
सतरंगी जिंदगी की डगर, तेरी ओर होगी।
सुन कर उसकी बातें, आशा की किरण जगी
जीवन फिर से हो सुन्दर, मुझे ऐसी लगन लगी।
अच्छा तुम्हें बताता हूँ. क्यूँ ये रंग मुझको भाते हैं
नीरस निर्दयी जीवन में ये, कैसे खुशियाँ लाते हैं।
ये पहला रंग बैंगनी मुझको, माँ से रोज मिलाता है
कहती थी ये रंग राजसी, इसकी याद दिलाता है।
छोटा था तो माँ मुझको, राजा बेटा कहती थी
उसके बुने बैंगनी स्वेटर में, ममता की गर्मी रहती थी।
दूजे रंग जामनी में, बचपन की यादें रहती हैं
हर रात मेरे कानों में ये, नयी कहानी कहती हैं।
गर्मी की छुट्टी में हम सब, जामुन आम चुराते थे
जीभ जामनी दिखा दिखा कर, सबको खूब खिझाते थे।
तीजा रंग है नीला जो, फैला नभ के विस्तारों में
नहीं असंभव कार्य कोई, तरुणावस्था के नारों में।
नीलवर्ण मुझे आज भी, उड़ने की शक्ति देता है
नित्य निराशा के दंशों की. पीड़ा पल में हर लेता है।
हरे रंग से जुडी हैं यादें, सावन में लगते झूलों की
मिट्टी की सौंधी खुशबू और, बागों में खिलते फूलों की।
विकल वेदना के अंगारे जब, हृदय को तड़पाते हैं
शीतल मंद मलय के झोंकें, आ मुझको सहलाते हैं।
रंग पाँचवाँ पीला मुझको, कोयल की कूक सुनाता है
ऋतुराज की भव्य छटा, मेरे समक्ष ले आता है।
पीले कपडे पहन के जब हम, मंद मंद मुस्काते थे
किसी काल्पनिक कथा पात्र बन, गीत सुरीले गाते थे।
रंग छठा मैंने सपनों में, उगते सूरज से पाया है
रात भले हो कितनी काली, भोर हमेशा आया है।
पाने से है त्याग बड़ा, ये भगवा याद दिलाता है
अज्ञानता के तिमिर में, सही मार्ग दिखलाता है।
सुर्ख गुलाबों के गुलदस्ते, जो मैंने उसको दिये नहीं
स्वप्न मधुर तो देखे थे पर, पूरे हमने किये नहीं।
प्रथम प्रणय की वो यादें, अंतिम रंग में रहती हैं
आज भी वो कितनी बातें, बिन शब्दों के कहती हैं।
यूँ कह मैंने सब रंगों को, स्मृति की तिजोरी से निकाला
और कंपकपाते हाथों से, रिक्तता की झोली में डाला।
बस उस एक रात के बाद, अब कभी न सोता हूँ
अपनी रिक्त जिंदगी के साथ, बेरंग स्वप्नों को ढोता हूँ।
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Tue, 22 Jun 2021 - 05min - 10 - मृत्यु (Death) - शची रानीTue, 22 Jun 2021 - 02min
- 9 - प्रतीक्षा (The Wait)
प्रतीक्षा
हृदय में लिए असीम वेदना
मस्तिष्क में विचित्र स्तब्धता
गहन उदासी के प्रति
मन की विचित्र बद्धता
भावनाओं का एक भंवर
मथता रहता है मन को
ज्यूँ दारुण दावानल कोई
निगल रहा हो वन को
नीरवता कुछ कहती दिखती
स्पंदन है चुप सा लगता
एक प्रश्नचिन्ह सा लगा है सम्मुख
समझो जितना और उलझता
भरे विश्व में एकाकीपन
मुझे आज क्यूँ लगता है
दर्पण में प्रतिबिम्ब भी अपना
अपरिचित अज्ञात सा दिखता है
निर्मम निष्ठुर नेत्र नहीं पर
रोम रोम नित रिसता है
पलकों में छिपा हर सपना मेरा
निश दिन पाटों में पिसता है
पल पल प्रतीक्षा है किसकी
क्यों हर क्षण युग सा लगता है
कौन है जिसकी आहट को
सुनने आतुर मन रहता है
- विवेक
(सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)
Fri, 18 Jun 2021 - 02min - 8 - चांदनी की पांच परतें - सर्वेश्वरदयाल सक्सेनाThu, 17 Jun 2021 - 02min
- 7 - हम दोनों (Two of Us) - Extended Version
हम दोनों
हम दोनों नदिया के तीरे
मध्य हमारे अविरल धारा
अलग अलग अपनी दुनिया पर
अनाद्यनंत रहे साथ हमारा
अलग अलग अपनी राहें हैं
अपनी अपनी जिम्मेदारी
अपनी खुशियां, अपने दुःख हैं
फिर भी अपनी साझेदारी
मेरे तट पर जब मावस का
घना अँधेरा छा जाता है
तेरे तट का पूनम चन्दा
मेरा मन भी बहलाता है
तेरे तट पर जब आंधी में
पुष्प लताएं सिहराती हैं
मेरे तट के वट वृक्षों की
शाख उधर ही बढ़ जाती हैं
ग्रीष्म ऋतू में तप्त हवायें
जब मेरे तट को झुलसाती हैं
तेरे तट से मंद बयारें
मरहम बन कर आ जाती हैं
तेरे तट पर जब सर्दी में
हिम की चादर बिछ जाती हैं
मेरे आलिंगन की गर्मी ले
शुष्क हवायें उड़ जाती हैं
कभी कोई पर्ण मेरे तट से
तेरे तट तक बह जाता है
अनकही बातों को मेरी
कान में तेरे कह जाता है
और कभी हवा का झोंका
तेरे तट से आ जाता है
तेरी श्वासों की खुशबू से
मेरा तट महका जाता है
एक तट पर एकाकीपन की
नीरवता जब छा जाती है
दूजे तट से एक सोन चिरैया
गीत हर्ष के गा जाती है
नहीं किये कोई वादे हमने
कोई वचन न तोड़े हैं
जीवन की ये बहती नदिया
हम दोनों को जोड़े है
- विवेक
(सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)
Sat, 12 Jun 2021 - 03min - 6 - सजल है कितना सवेरा - महादेवी वर्मा
महादेवीजी का शब्दों का चुनाव तो विलक्षण था ही परन्तु कविता के माध्यम से एक रंग बिरंगा चित्र बना देने की उनकी शक्ति अतुलनीय थी
उनकी कविताओं में एक अलग ही सम्मोहन शक्ति है जो पाठकों और श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर एक मायानगरी में ले जाती है जहां आप भावनाओं की निर्झरिणी में गोते लगाते रहने के लिए विवश हो जाते हैं
सजल है कितना सवेरा
गहन तम में जो कथा इसकी न भूला
अश्रु उस नभ के, चढ़ा शिर फूल फूला
झूम-झुक-झुक कह रहा हर श्वास तेरा
राख से अंगार तारे झर चले हैं
धूप बंदी रंग के निर्झर खुले हैं
खोलता है पंख रूपों में अंधेरा
कल्पना निज देखकर साकार होते
और उसमें प्राण का संचार होते
सो गया रख तूलिका दीपक चितेरा
अलस पलकों से पता अपना मिटाकर
मृदुल तिनकों में व्यथा अपनी छिपाकर
नयन छोड़े स्वप्न ने खग ने बसेरा
ले उषा ने किरण अक्षत हास रोली
रात अंकों से पराजय राख धो ली
राग ने फिर साँस का संसार घेरास्रोत
पुस्तक : संधिनी
रचनाकार : महादेवी वर्मा
प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन
संस्करण : 2012
Fri, 04 Jun 2021 - 02min - 5 - हम दोनों (Two of Us)
हम दोनों नदिया के तीरे
मध्य हमारे अविरल धारा
अलग अलग अपनी दुनिया पर
अनाद्यनंत रहे साथ हमारा
अलग अलग अपनी राहें हैं
अपनी अपनी जिम्मेदारी
अपनी खुशियां, अपने दुःख हैं
फिर भी अपनी साझेदारी
कभी कोई पर्ण मेरे तट से
तेरे तट तक बह जाता है
अनकही बातों को मेरी
कान में तेरे कह जाता है
और कभी हवा का झोंका
तेरे तट से आ जाता है
तेरी श्वासों की खुशबू से
मेरा तट महका जाता है
- विवेक
(सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)
Thu, 03 Jun 2021 - 02min - 4 - परशुराम की प्रतीक्षा (खण्ड-2) - रामधारी सिंह 'दिनकर'
१९६२ में भारत चीन युद्ध में जब भारत को पराजय का सामना करना पड़ा तो पूरा देश स्तब्ध था और दिनकरजी भी इसका अपवाद नहीं थे स्वाभिमान पर लगी चोट और वीर सैनिकों के बलिदान के दुःख की अभिव्यक्ति है परशुराम की प्रतीक्षा
दिनकरजी को कैसा प्रतीत हुआ होगा, इसका अनुभव मुझे २६ नवम्बर २००८ को हुआ जब मुंबई आतंकी हमलों के पश्चात देश में विवशता का वातावरण था ऐसा लग रहा था की कोई भी हमारे नगरों में आकर हम पर आक्रमण कर सकता है और हम कुछ नहीं कर सकते
तब ये एक बार पुनः स्मरण हो आया था की शांति के लिए शक्ति और शक्ति प्रदर्शन अनिवार्य है और तभी आरम्भ हो गयी थी एक प्रतीक्षा
Wed, 02 Jun 2021 - 05min - 3 - आव्हान (A Clarion Call)
आव्हान
पंच तत्व काया सागर की
सजल नेत्रों की सीपी में
विकल वेदना के अश्रु ये
मृत्यु तक सहेज रख लूँ
इहलोक से प्रस्थान कर जब
जाऊँगा मिलने उस प्रभु से
देकर भेंट अश्रु के मोती
पूछूँगा कुछ प्रश्न अवश्य मैं।
घना अँधेरा छाया जग में
क्यों तज कर इसको सोया है
अधर्म, अन्याय की पीड़ा से
जब जन जन, नित नित रोया है
कोटि कंसों के कृत्यों को
क्या मूक समर्थन तेरा है
अपराधियों के मस्तक पर
क्या वरद हस्त भी फेरा है
दूषित हो गयी धरती तेरी
गंगा भी अब मैली है
प्रेम का तो नाश हो गया
घृणा हर तरफ फैली है
अन्नपूर्णा की अवनि पर
क्यों बच्चे भूखे सोते हैं
दरिद्रता के दंश से घायल
लाखों बचपन रोते हैं
क्या द्रवित हृदय नहीं कहता तेरा
ले लूँ विश्व निज आलिंगन में
सांत्वना का सौम्य स्पर्श दे
भर दूँ खुशियां हर आँगन में
प्रह्ललाद की एक पुकार पर
वैकुण्ठ प्रभु तुम छोड़े थे
गजराज के क्रंदन को सुनकर
नग्न पाँव ही दौड़े थे
सिया हरण कर एक दशानन
युगों युगों से जलता है
पर पापी उसे से भी बड़ा
गली गली में पलता है
दुःशासनों के दुष्कर्मों ने
जब द्रौपदियों को रुला दिया
विनाशाय च दुष्कृताम् का
वचन क्यों तूने भुला दिया
आस्था भी तो लुप्त हो रही
विश्वास कहाँ फिर टिकता है
धर्म कैसे फिर शेष रहे जब
न्याय यहाँ नित बिकता है
अब यदि कहते हो इठलाकर
मांग ले जो मांगता है
अरे क्यूं माँगूं मैं कुछ तुझसे
जब मेरा मन जानता है
तब न दिया तुमने कुछ हमको
अब कैसे तुम दे पाओगे
संकीर्ण हृदय की परिधियों से
बाहर कैसे आ पाओगे
पर उचित नहीं आरोप ये मेरा
कि दया नहीं हृदय में तेरे
मैं ही तुझको देख न पाया
तू तो हरदम साथ था मेरे
तूने ही तो दिया है हमको
लोकतंत्र का ये उपहार
समय आ गया उठ खड़े हों
करें मतों का प्रचंड प्रहार
यथा राजा तथा प्रजा का
युग दशकों पहले बीत गया
जैसी जनता, वैसा शासन
प्रजातंत्र का गीत नया
कल का क्लेश, करुण क्रंदन
आज आक्रोश का आव्हान हो
उठो चलो एक सुर में बोलें
प्रखर प्रचंड प्रतिपादन हो
नाद नया नभ में गूंजे यूँ
सिंहासन भी डोल पड़ें।
जोश ध्वनि में भर लो इतना
मूक वधिर भी बोल उठें
बहुत हो गया विलाप, प्रलाप अब
हम ना तुझे पुकारेंगे
अपनी नियति अपने हाथों से
अब हम स्वयं संवारेंगे
- विवेक
(सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)
Mon, 31 May 2021 - 05min - 2 - वीणाMon, 31 May 2021 - 02min
- 1 - एक क्षण (One Moment)Mon, 31 May 2021 - 01min
Podcasts similar to Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)
El Partidazo de COPE COPE
Herrera en COPE COPE
La Linterna COPE
Es la Mañana de Federico esRadio
La noche de Cuesta esRadio
Hondelatte Raconte Europe 1
Au Coeur du Crime Europe1
Affaires sensibles France Inter
LEGEND Guillaume Pley
El colegio invisible OndaCero
La Rosa de los Vientos OndaCero
Les grands dossiers de l'Histoire par Franck Ferrand Radio Classique
Espacio en blanco Radio Nacional
Enquêtes criminelles RTL
Entrez dans l'Histoire RTL
Le grand récit RTL
Les Grosses Têtes RTL
L'Heure Du Crime RTL
Parlons-nous RTL
El Larguero SER Podcast
SER Historia SER Podcast
Todo Concostrina SER Podcast
HISTORIAS DE LA HISTORIA VIVA RADIO
Other Arts Podcasts
Kes me oleme? Kust me tuleme? Postimees podcast Raadio
蔣勳_美的沉思 回來認識自己 蔣勳
La nostra Liguria, il nostro futuro Legacoop Liguria
Un Libro Una Hora SER Podcast
Vorbitorincii-Baricade-Leaders Catalin Striblea, Radu Paraschivescu, Radu Naum
رادیو دچارانه DaryaSalar
Mellina Marcin MELLER
Bag om København Københavns Biblioteker
روائع المسلسلات الإذاعية Podcast Record
La Mano Peluda Juan Felipe Buitrago Aguirre
Sherlock Holmes - Audiolibri Audioraccontando
موسوعة الكتب الصوتية Podcast Record
The Jimmy Dore Show Jimmy Dore
Сказки Морфея на ночь |Медитации для сна| Mikhail
Daily Instrumental William Spurlin
Audio libri e Audio racconti Artisti Fuori Posto
Аудиокниги на любой вкус. Крутяков Павел Сергеевич
Techno Life Eversong Music
Summer Tam G Multi
LD50 - techno LD50
