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Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

1267 - Teddy Bear Main Bache Hue Bhalu | Gyanendrapati
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  • 1267 - Teddy Bear Main Bache Hue Bhalu | Gyanendrapati

    टेडी  बियर में बचे हुए भालू।  ज्ञानेन्द्रपति 


    बच्चियाँ जब

    अपने टेडी बियर  को छाती से चिपकाए

    दुलार रही होंगी

    छीज रहे भारतीय जंगलों में

    और खोजी दलों और अनुसंधान-स्टेशनों के

    कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में

    बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू

    काले भालू और भूरे भालू


    बगैर किसी रंग-भेद के

    कौन मार रहा होगा उन्हें 

    अपने टेडी बियर को छाती से लगाए

    सो जानेवाली बच्चियाँ

    क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे

    निहायत मुलायमियत से उनके आलिंगन से

    छुल्लक भल्लूक को हटा उन्हें रजाई उढ़ानेवाले  पापा

    आज ही कहा था जिन्होंने-बेटे, पुराना पड़ गया है यह

    कल ही बाजार से ला देंगे तुम्हारे लिए

    एक नया टेडी बियर

    प्यारा-सा टेडी बियर -

    वही पापा

    मदारियों से मुक्त करा

    भालुओं को बरास्ते चिड़ियाखाना वापिस जंगल

    भिजानेवाले मोह से भरे उनके पापा

    शामिल हैं

    उनके और अपने भी अनजाने

    भालुओं के हत्यारों में

    और बेहतर कि इसे कभी न जानें जंगली मधुमक्खियाँ

    कि शहदखोर शहदचोर भालुओं के लिए विलाप-नृत्य करती हुई

    भंभोड़ डालें बस्तियों पर बस्तियाँ

    आत्मघाती अभियानों में

    नहीं, नहीं जान सकेंगी बच्चियाँ इसे

    और न जान पाएँगे उनके प्यारे पापा

    और पीढ़ी-दर-पीढ़ी

    जंगली प्रदेशों से और बर्फ़ानी प्रदेशों से अंततः मिट गए भालू

    टेडी बियर बनकर दुकानों के शो केसों में वैठे रहेंगे अतीतातीत

    वत्सल पिताओं की प्रतीक्षा में

    मोहित बच्चियों की ममतालु बाँहों के बीच होगी उनकी अंतिम शरणस्थली

    उनकी आत्मा को मिलेगा अभयारण्य


    जहाँ माँ चिड़िया की तरह देह ही नहीं मन-प्राण की उष्मा से

    सेयेंगे वे

    वक्षांकुर

    भविष्योन्मुख ।

    Mon, 21 Sep 2026
  • 1266 - Bachcha | Indu Jain

    बच्चा । इन्दु जैन


    औरत के सिर पर गठरी है

    कमर पर बच्चा

    मर्द हाथ में बक्सा

    लटकाये है

    बच्चा रो रहा है लगातार

    हाथ-पाँव पटक रहा

    बार-बार

    औरत के समझाने

    मर्द के झुँझलाने के बावजूद

    वह पैर-पैर चलना

    चाहता है

    और

    गठरी अपने सिर पर

    उठाना चाहता है।


    Sun, 20 Sep 2026
  • 1265 - Kavitayein | Dharmesh

    कविताएँ । धर्मेश


    ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ


    शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या

    मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से


    लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की

    जंगल की हत्या पर आमादा शहर


    चीर चुका है नदी का हृदय

    सियारों को गाली देने वाले आदमी ने


    नोच खाया है एक और आदमी को

    मेरी आँखों में अब भी बचा है प्रेम


    ये इस दुनिया की तबाही का सूत्र है


    Sat, 19 Sep 2026
  • 1264 - Angootha Chaap Neta | Kaka Hathrasi

    अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी


    चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश।


    पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास?

    कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे।


    शामिल रहते हो या मात-पिता से न्यारे?

    कह ‘काका’ कवि, छान-बीन काफ़ी की जाती।


    साथ सिफ़ारिश हो, तब ही सर्विस मिल पाती॥

    कर्मचारियों के लिए, है अनेक दुख-द्वंद्व।


    नेताजी के वास्ते, एक नहीं प्रतिबंध॥

    एक नहीं प्रतिबंध, मंच पर झाड़े लेक्चर।


    वैसे उनकी भैंस बराबर काला अक्षर॥

    कह ‘काका’, दर्शन करवा सकता हूँ प्यारे।


    एम.एल.ए. कई, ‘अँगूठा छाप’ हमारे॥

    Fri, 18 Sep 2026
  • 1263 - Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul

    बिटिया मुर्मू के लिए |  निर्मला पुतुल


    उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो

    उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़


    उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो

    जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है

    उठती है जैसी राख में दबी चिनगारी


    देखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त पर

    जहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़

    कुल्हाड़ियों के सामने असहाय

    रोज़ नंगी होती बस्तियाँ

    एक रोज़ माँगेगी तुमसे

    तुम्हारी ख़ामोशी का जवाब


    सोचो-

    तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैं

    तुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों पर

    कैसा लगता है तुम्हें जब

    तुम्हारी ही चीज़ें

    तुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं ?


    Thu, 17 Sep 2026
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