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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
- 1267 - Teddy Bear Main Bache Hue Bhalu | Gyanendrapati
टेडी बियर में बचे हुए भालू। ज्ञानेन्द्रपति
बच्चियाँ जब
अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाए
दुलार रही होंगी
छीज रहे भारतीय जंगलों में
और खोजी दलों और अनुसंधान-स्टेशनों के
कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में
बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू
काले भालू और भूरे भालू
बगैर किसी रंग-भेद के
कौन मार रहा होगा उन्हें
अपने टेडी बियर को छाती से लगाए
सो जानेवाली बच्चियाँ
क्या कभी सपने में भी जान सकेंगी इसे
निहायत मुलायमियत से उनके आलिंगन से
छुल्लक भल्लूक को हटा उन्हें रजाई उढ़ानेवाले पापा
आज ही कहा था जिन्होंने-बेटे, पुराना पड़ गया है यह
कल ही बाजार से ला देंगे तुम्हारे लिए
एक नया टेडी बियर
प्यारा-सा टेडी बियर -
वही पापा
मदारियों से मुक्त करा
भालुओं को बरास्ते चिड़ियाखाना वापिस जंगल
भिजानेवाले मोह से भरे उनके पापा
शामिल हैं
उनके और अपने भी अनजाने
भालुओं के हत्यारों में
और बेहतर कि इसे कभी न जानें जंगली मधुमक्खियाँ
कि शहदखोर शहदचोर भालुओं के लिए विलाप-नृत्य करती हुई
भंभोड़ डालें बस्तियों पर बस्तियाँ
आत्मघाती अभियानों में
नहीं, नहीं जान सकेंगी बच्चियाँ इसे
और न जान पाएँगे उनके प्यारे पापा
और पीढ़ी-दर-पीढ़ी
जंगली प्रदेशों से और बर्फ़ानी प्रदेशों से अंततः मिट गए भालू
टेडी बियर बनकर दुकानों के शो केसों में वैठे रहेंगे अतीतातीत
वत्सल पिताओं की प्रतीक्षा में
मोहित बच्चियों की ममतालु बाँहों के बीच होगी उनकी अंतिम शरणस्थली
उनकी आत्मा को मिलेगा अभयारण्य
जहाँ माँ चिड़िया की तरह देह ही नहीं मन-प्राण की उष्मा से
सेयेंगे वे
वक्षांकुर
भविष्योन्मुख ।
Mon, 21 Sep 2026 - 1266 - Bachcha | Indu JainSun, 20 Sep 2026
- 1265 - Kavitayein | Dharmesh
कविताएँ । धर्मेश
ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ
शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या
मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से
लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की
जंगल की हत्या पर आमादा शहर
चीर चुका है नदी का हृदय
सियारों को गाली देने वाले आदमी ने
नोच खाया है एक और आदमी को
मेरी आँखों में अब भी बचा है प्रेम
ये इस दुनिया की तबाही का सूत्र है
Sat, 19 Sep 2026 - 1264 - Angootha Chaap Neta | Kaka Hathrasi
अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी
चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश।
पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास?
कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे।
शामिल रहते हो या मात-पिता से न्यारे?
कह ‘काका’ कवि, छान-बीन काफ़ी की जाती।
साथ सिफ़ारिश हो, तब ही सर्विस मिल पाती॥
कर्मचारियों के लिए, है अनेक दुख-द्वंद्व।
नेताजी के वास्ते, एक नहीं प्रतिबंध॥
एक नहीं प्रतिबंध, मंच पर झाड़े लेक्चर।
वैसे उनकी भैंस बराबर काला अक्षर॥
कह ‘काका’, दर्शन करवा सकता हूँ प्यारे।
एम.एल.ए. कई, ‘अँगूठा छाप’ हमारे॥
Fri, 18 Sep 2026 - 1263 - Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul
बिटिया मुर्मू के लिए | निर्मला पुतुल
उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो
उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़
उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो
जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है
उठती है जैसी राख में दबी चिनगारी
देखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त पर
जहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़
कुल्हाड़ियों के सामने असहाय
रोज़ नंगी होती बस्तियाँ
एक रोज़ माँगेगी तुमसे
तुम्हारी ख़ामोशी का जवाब
सोचो-
तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैं
तुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों पर
कैसा लगता है तुम्हें जब
तुम्हारी ही चीज़ें
तुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं ?
Thu, 17 Sep 2026 - 1262 - Santulan Ke Liye | Shayak Alok
संतुलन के लिए । शायक आलोक
वे जिस दुनिया में आए हैं वह है
एक हँसती खिलखिलाती दुनिया।
सब सुंदर है, लगे उन्हें
इसलिए मैं मुस्कुरा देता हूँ
नए बच्चों की तरफ़
आँखें मिचमिचा देता हूँ।
एक दुख की कथा से
दूसरे दुख के किरदार को मिलता है सहारा
इसलिए मैंने अपवित्र पवित्रताओं को जीवन में उतारा।
दुनिया के सार्वजनिक शोकागार में आँखें नम रखता हूँ
संतुलन के कई पाठ रचे
वे ही रहीं सबसे कम सुंदर स्त्रियाँ
जिन्हें मैं करता रहा दुनिया का सबसे अधिक प्रेम।
Wed, 16 Sep 2026 - 1261 - Koi Mere Saath Chale | Sarveshwar Dayal Saxena
कोई मेरे साथ चले। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
मैंने कब कहा
कोई मेरे साथ चले
चाहा ज़रूर!
अक्सर दरख्तों के लिये
जूते सिलवा लाया
और उनके पास खडा रहा
वे अपनी हरीयाली
अपने फूल फूल पर इतराते
अपनी चिडियों में उलझे रहे
मैं आगे बढ गया
अपने पैरों को
उनकी तरह
जडों में नहीं बदल पाया
यह जानते हुए भी
कि आगे बढना
निरंतर कुछ खोते जाना
और अकेले होते जाना है
मैं यहाँ तक आ गया हूँ
जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं
मुझे घेरे हुए हैं......
किसी साथ के
या डूबते सूरज के कारण
मुझे नहीं मालूम
मुझे
और आगे जाना है
कोई मेरे साथ चले
मैंने कब कहा
चाहा ज़रूर!
Tue, 15 Sep 2026 - 1260 - Ahaa Buddhimanon Ki Basti | Mahesh Anagh
अहा बुद्धिमानों की बस्ती । महेश अनघ
अहा बुद्धिमानों की बस्ती
या तो चुप्पी या तकरार -
कोने-कोने भूत बियाने
सारा घर सन्नाटेदार ।सूचीबद्ध हुई दिनचर्या
मज़बूरी रेखांकित है
चौके से चूल्हे की अनबन
हर भांडा आतंकित है
किसी ख़ास दिन ख़ास वजह से
काग़ज़ पर लिखते हैं प्यार।यों तो इस भुतहा बाखर में
कोई आएगा ही क्यों
जिस धन से ख़ुशबू ग़ायब है
उसे चुराएगा ही क्यों
फिर भी ताला है, कुत्ता है
और गोरखा चौकीदार ।अपना क़द ऊँचा रखने में
झुक कर चलना छूट गया
विज्ञापन से जोड़ा रिश्ता
विज्ञापन से टूट गया
इतनी चीज़ें जुड़ीं कि हम भी
चीज़ों में हो गए शुमार ।Mon, 14 Sep 2026 - 1259 - Maa Ke Liye Nahi Likhi Kavita | Tanwir Sheikh 'Ilham'
माँ के लिए नहीं लिखी कविता । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’
आज तक
मैंने एक भी कविता
माँ के लिए या उनके नाम पर नहीं लिखी
लिखना भी चाहा तो
नही लिख पाया
बहुत कोशिश की
हर भाषा
हर बोली
हर शब्द के आंगन गया
पर वो अक्षर ढूंढ न सका
जो माँ को परिभाषित कर सके
जो माँ की ममता और
उनके त्याग को रेखांकित कर सके
मैं दूंढ़ ही नहीं पाया
पूरी दुनिया की भाषाओं में
जो ढाल सके माँ को कविताओं में
अंतः मैंने इस प्रयास में पाया
मुझे तो ख़ुद गढ़ा है माँ ने
मैं ही तो हूँ उनकी कविता
उनका अंश
जो गढ़ रहा है कविताएं
Sun, 13 Sep 2026 - 1258 - Sirf Pyar Karti Hain Titliyan | Jaiprakash Manas
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ । जयप्रकाश मानस
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ
हाँ तितलियाँ
फूलों से लता-वल्लरियों से
अचीन्हे पराए मंजरियों से
कहाँ परवाह
कि झट झर जाएँगे पर
नहीं झंझट
कभी जा पहुँचें नभ पर
तनिक न भय
कि जीवन दो दिना
बस यही सच
प्यार है अर्थ—शब्द जीना
धरा-विस्तार करती हैं तितलियाँ
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ।
Sat, 12 Sep 2026 - 1257 - Kuch To Is Dil Ko Sazaa Di Jaye | Mohammad Alvi
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए । मोहम्मद अल्वी
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए
उस की तस्वीर हटा दी जाए
ढूँडने में भी मज़ा आता है
कोई शय रख के भुला दी जाए
नाम लिख लिख के तिरा काग़ज़ पर
रौशनाई भी गिरा दी जाए
नाव काग़ज़ की बना कर उस को
बहते पानी में बहा दी जाए
रात को चुपके से इक इक घर की
क्यूँ न ज़ंजीर लगा दी जाए
नींद में चौंक पड़ेगा कोई
आओ उस दर पे सदा दी जाए
आख़िरी साँस महक जाएगी
उस के दामन की हवा दी जाए
सब के सब याद चले आते हैं
आज किस किस को दुआ दी जाए
'अल्वी' होटल में ठहर सकता है
क्यूँ उसे घर में जगह दी जाए
Fri, 11 Sep 2026 - 1256 - Maskhari | Ashutosh Sharma
मसखरी । आशुतोष शर्मा
गए रोज़ इक दोस्त को मिल गयी उसकी खोई हुई प्रेमिका
मुझे उसकी खोई हुई हंसी को पा जाने की थी ख़ुशी
लौट आने का सुख सबको नहीं मिलता,
हँसी मिल जाती है और भी कई बहानों से
प्रेमिकाओं के चले जाने का दुःख सबको नहीं मिलता
जिनको लगता है मैं हूँ एक हंसोल मसखरा
संवेदना का मज़ाक उड़ाता हुआ
उपेक्षा का एक भदेस चरवाहा
तो हाँ ,
किसी रोज़ खो गई थी मेरी भी प्रेमिका
और हँसी भी
वो और बात है कि अकुताकर मैंने ही चुनी थी
प्रेम और हँसी के बीच...
Thu, 10 Sep 2026 - 1255 - Jab Main Thaka Hua Ghar Aaun | Shakunt Mathur
जब मैं थका हुआ घर आऊँ । शकुन्त माथुर
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो।
चाहे दिन भर बहें पसीने
कितने भी हों कपड़े सीने
बच्चा भी रोता हो गीला
आलू भी हो आधा छीला
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो
सब तूफ़ान रुके हों घर के
मुझको देखो आँखें भर के
ना जूड़े में फूल सजाए
ना तितली से वसन, न नखरे
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो
अधलेटी हो तुम सोफ़े पर
फॉरेन मैगज़ीन पढ़ती हो
शीशे सा घर साफ़ पड़ा हो
आहट पर चौंकी पड़ती हो
तुम कविता मत लिखो सलोनी,
मैं काफी हूँ, तुम प्रियतर हो
जब मैं थका हुआ घर आऊँ,
तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो।
Wed, 09 Sep 2026 - 1254 - Aaj Mujhse Door Duniya | Harivansh Rai Bachchan
आज मुझसे दूर दुनिया । हरिवंशराय बच्चन
आज मुझसे दूर दुनिया!
भावनाओं से विनिर्मित,
कल्पनाओं से सुसज्जित,
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
‘बात पिछली भूल जाओ,
दूसरी नगरी बसाओ’—
प्रेमियों के प्रति रही है, हाय, कितनी क्रूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
वह समझ मुझको न पाती,
और मेरा दिल जलाती,
है चिता की राख कर मैं माँगती सिंदूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
Tue, 08 Sep 2026 - 1253 - Bhram | Sushma Kumari
भ्रम । सुषमा कुमारी
आसमान में अब बादल नहीं दिखता
दिखता है बादल के होने का एक भ्रम
पेड़ों पर अब चिड़ियाँ नहीं रहती
रहता है उनके होने का एक भ्रम।
फूर्लों पर अब मधुमक्खियाँ नहीं होतीं
और सड़कों पर अब नहीं होते रास्ते!
इसी तरह
जंगल में अब जंगल नहीं बसता
थाली में नहीं होती रोटी
अख़बार में नहीं होता समाचार,
जीवन में नहीं होता प्रेम!
अब किसान की आत्मा में नहीं बची खेती
युवाओं के आँखों में नहीं बचे सपने
बच्चों के हा्थों में नहीं बचे खिलौने!
देश में अब नहीं बचा देश
आदमी में नहीं बचा थोड़ा-सा आदमी!
हमारे-तुम्हारे परिदृश्य में
इन दिनों बस बचा रह गया है
सबके होने का एक भ्रम!
हमारी-तुम्हारी कलाई पर बंधी घड़ी में
नहीं बचा अच्छा या बुरा समय!
हम विकास की दुनिया के
अभिमंत्रित लोग हैं
जिन्हें अपने ही परिदृश्य से
गायब होती चीज़ें
अब दिखाई नहीं देती!
Mon, 07 Sep 2026 - 1252 - Main Duniya Ki Haqeeqat Jaanta Hun | Naqsh Lyallpuri
मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी
मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ
किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ
मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से
मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ
तेरी यादें हैं शब-बेदारियाँ हैं
है आँखों को शिकायत जानता हूँ
मैं रुस्वा हो गया हूँ शहर-भर में
मगर किस की बदौलत जानता हूँ
ग़ज़ल फूलों सी दिल सहराओं जैसा
मैं अहल-ए-फ़न की हालत जानता हूँ
तड़प कर और तड़पाएगी मुझ को
शब-ए-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ
सहर होने को है ऐसा लगे है
मैं सूरज की सियासत जानता हूँ
दिया है 'नक़्श' जो ग़म ज़िंदगी ने
उसे मैं अपनी दौलत जानता हूँ
Sun, 06 Sep 2026 - 1251 - Akoo (Main) | Khairul Anwar
अकू | ख़ैरुल अनवर
अनुवाद : जितेंद्र कुमार त्रिपाठी
अगर मेरा अंतिम समय आ जाए तो
मैं नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे दिलासा दे
तुम भी नहीं
मुझे उन आँसुओं की ज़रूरत नहीं
मैं भेड़िया हूँ
अपने झुंड से अलग
चीरने दो गोलियों को मेरी चर्बी
मैं फिर भी डटा रहूँगा
घाव और विष दोनों ही
संग-साथ लेकर
दौड़ता रहूँगा
जब तक यह चुभता दर्द जाता नहीं
और किंचित ही परवाह किए बिना
मैं जीना चाहता हूँ
एक हज़ार साल और…
(अकू : इंडोनेशियाई भाषा में—मैं)
Sat, 05 Sep 2026 - 1250 - Barsaati Jhonka | Dharamvir BhartiFri, 04 Sep 2026
- 1249 - Sabhi Ped Ek Phool Hain | Anurag Tiwari
सभी पेड़ इक फूल हैं। अनुराग तिवारी
सभी पेड़ इक फूल हैं
जो प्रेम में दिए गए
उपहार हैं।
जिसे दिया होगा
एक प्रेमिका के रूप में
पृथ्वी ने
हाथ बढ़ा कर
अपने प्रेमी
आकाश को!
सभी नदियां इक लम्बा खत हैं
जिसे लिखा होगा
इस छोर की प्रेमिका ने
उस छोर के प्रेमी को
सुनो,
जो तुम फूलों को काट रहे हो
इस संवेदनहीन होती दुनिया में
प्रेम के लिए बढ़े हाथ को
काट रहे हो..
कभी क्षमा नहीं किए जाओगे!
Thu, 03 Sep 2026 - 1248 - Aisa Bhi Ho Sakta Hai | Balli Singh Cheema
ऐसा भी हो सकता है | बल्ली सिंह चीमा
साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो, ऐसा भी हो सकता है,
मरने वाला ही क़ातिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।
आज तुम्हारी मंज़िल हूँ मैं, मेरी मंज़िल और कोई,
कल को अपनी इक मंज़िल हो, ऐसा भी हो सकता है ।
साहिल की चाहत है लेकिन, तैर रहा हूँ बीचों-बीच,
मंझधारों में ही साहिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।
तेरे दिल की धडकन मुझको लगे है अपनी-अपनी-सी,
तेरा दिल ही मेरा दिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।
जीवन भर भटका हूँ ‘बल्ली’, मंज़िल हाथ नहीं आई,
मेरे पैरों में मंज़िल हो ऐसा भी हो सकता है ।
Wed, 02 Sep 2026 - 1247 - Kya Wo Din Bhi Din Hain | Rahi Masoom Raza
क्या वो दिन भी दिन हैं | राही मासूम रज़ा
क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।
हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।
इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।
हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।
Tue, 01 Sep 2026 - 1246 - Akanksha | Nandkishore Acharya
आकाँक्षा । नंदकिशोर आचार्य
एक अतीत रक्त की भाँति
प्रवाहित रहता है मुझमें
एक भविष्य ने साँसों की तरह
बाँध रखा है मुझे
और मैं - घड़ी को सुई -
भविष्य के अतीत में बदलने की
सूचना मात्र देता रह जाता हूँ।
क्या कभी नहीं हो सकता यह
एक पल के लिए ही सही
अतीत और भविष्य
मुझमें न मिल पाएँ
और तब मैं
मेरा सहारा लेने के लिए हाथ फैलाते
भयभीत ईश्वर
और मृत्यु को
शून्य में छटपटाते हुए
देख लूँ!
Mon, 31 Aug 2026 - 1245 - Tum Sudhi Ban Bankar Baar Baar | Bhagwati Charan Verma
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार । भगवतीचरण वर्मा
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार
क्यों कर जाती हो प्यार मुझे?
फिर विस्मृति बन तन्मयता का
दे जाती हो उपहार मुझे
मैं करके पीड़ा को विलीन
पीड़ा में स्वियं विलीन हुआ
अब असह बन गया देवि,
तुम्हारी अनुकम्पा का भार मुझे
माना वह केवल सपना था,
पर कितना सुन्दर सपना था
जब मैं अपना था, और सुमुखि
तुम अपनी थीं, जग अपना था
जिसको समझा था प्यार, वही
अधिकार बना पागलपन का
अब मिटा रहा प्रतिपल,
तिल-तिल, मेरा निर्मित संसार मुझे
Sun, 30 Aug 2026 - 1244 - Gehri Raat Hai | Zeb Ghauri
गहरी रात है । ज़ेब ग़ौरी
गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत
घर के दर-ओ-दीवार भी हैं कमज़ोर बहुत
दर-ओ-दीवार: दरवाज़ा और दीवार
तेरे सामने आते हुए घबराता हूँ
लब पे तेरा इक़रार है दिल में चोर बहुत
इक़रार: स्वीकार करना
नक़्श कोई बाक़ी रह जाए मुश्किल है
आज लहू की रवानी में है ज़ोर बहुत
नक़्श: रेखाचित्र
दिल के किसी कोने में पड़े होंगे अब भी
एक खुला आकाश पतंगें डोर बहुत
मुझ से बिछड़ कर होगा समुंदर भी बेचैन
रात ढले तो करता होगा शोर बहुत
आ के कभी वीरानी-ए-दिल का तमाशा कर
इस जंगल में नाच रहे हैं मोर बहुत
वीरानी-ए-दिल: मन के वीरान होने की अवस्था
अपने बसेरे पंछी लौट न पाया 'ज़ेब'
शाम घटा भी उट्ठी थी घनघोर बहुत
Sat, 29 Aug 2026 - 1243 - Tadap Kar Jigar Munh Ko Aa Jaye Hai | Firaaq Gorakhpuri
तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है । फ़िराक़ गोरखपुरी
तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है
उसे देख कर कब रहा जाए है
किसू ने न अब तक बताया हमें
ग़म-ए-हिज्र में क्या किया जाए है
मोहब्बत में ऐ मौत ऐ ज़िंदगी
जिया जाए है या मरा जाए है
रुमूज़-ए-बहाराँ जो पूछो हो तुम
गुल अपने लहू में नहा जाए है
मुझे पा के तन्हा मिरी बेकसी
सर-ए-शाम बिस्तर लगा जाए है
मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़
तिरे घर को हर रास्ता जाए है
Fri, 28 Aug 2026 - 1242 - Dhat | Krishna Mohan Jha
धत । कृष्णमोहन झा
चाय-बिस्कुट-नमकीन
धत
चुटकुलों और निन्दाओं और नक़ली ठहाको
धत
होड़ लेती विनम्रताओं और खोखली सुंदरताओं
धत
राजनीतिक रूप से सही कविताओं
और पुरस्कार के लिए लार टपकाती जिह्वाओं
धत
बर्थडे-मैरेजडे-मदर्सडे-फ़ादर्सडे-चिल्ड्रेंसडे- टीचर्सडे-
हेल्थडे-ड्रायडे आदि
धत
महँगाई-भत्ता और इन्क्रीमेंट
धत
जीवनबीमा और मेडिकल इंश्योरेंस
धत
होमलोन-आरडी-जीपीएफ-पीपीएफ
धत
शर्मा-वर्मा-कुमार- गुप्ता-मिश्रा चौहान- राव-रंजन-झा इत्यादि
धत
रेंगने-रिरियाने की भाषा
धत एक कील में कब से ठुकी हुई
मनुष्य होने की अन्तिम परिभाषा
इन भाषाओं और परिभाषाओं को तोड़-फोड़कर
अपने सारे कपड़े-लत्ते छोड़कर
निष्कवच और निर्वस्त्र
मैं निकल जाना चाहता हूँ एक ऐसी अन्तहीन यात्रा पर
अपनी त्वचा तक उतार सकना शामिल हो जिसमें
फिर मैं देखता हूँ
वह कौन है जो आता है मेरे साथ
और कौन रक्त से छलछलाते मेरे शरीर पर फेंकता है पत्थर
Thu, 27 Aug 2026 - 1241 - O Chidiya | Aishwarya Tiwari
ओ चिड़िया! । ऐश्वर्या तिवारी
ओ चिड़िया
आ बैठ खिड़की पे
मैं मरीज़ इस दुनियादारी का
देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से
आ बैठ संग मेरे
बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर?
क्या इतनी ही उलझन है उधर?
मैं क़ैदी हूँ कितने बंधन का
क्या जानूँ जिसे छू लूँ
उलझ जाए वो भी दो-एक डोर में।
दिल का बीमार हूँ इतना कि
बाज़ार से ले आपा था पिंजरा,
वो कहते हैं
जिससे होता है प्रेम उसे रखते हैं संग हमेशा
रखा है अब भी वो किसी कोने में
जिसकी सलाखों पर लिखा है बाज़ारू भाषा में - प्रेम।
आ बैठ तू फिर भी
छोड़ तमाम दुनिया की भाषा-परिभाषा
छोड़ यह पिंजरा-विंजरा
मैं डाल दूंगा उसमें अपना जूता
तू बता-
कैसा है सब वहाँ
जहाँ कहीं से आई है तू?
आ मुझसे बतिया
इसी बहाने अरसों से पड़ी बंद खिड़की खुल जाएगी
फिर कौन है जो आकर यहाँ बैठेगी गाएगी
आ मुझे तनिक प्रेम करने दे
आ कि जीवन में जीवन रस भरने दे
मैं नहीं कहता तेरा यही ठिकाना है
आ कि तुझे एक दिन उड़ ही जाना है।
Wed, 26 Aug 2026 - 1240 - Seedhi Si Baat | Pablo Neruda | Translation - Manglesh DabralTue, 25 Aug 2026
- 1239 - Drishya Aur Bimb | Rajesh Joshi
दृश्य और बिम्ब। राजेश जोशी
एक सिनेमा घर के सामने छूटी हुई जगह में
एक नए मॉडल की चमचमाती कार
एक विकलांग बच्चे को डरा रही है
कार धीरे धीरे आगे सरक रही है
और डरता, घबराता, गिरता पड़ता
उल्टे पाँव दौड़ने की कोशिश कर रहा है
बच्चा
ड्राइवर मुस्कुरा रहा है
और आसपास खड़े तमाशबीन अंदर ही अंदर डर रहे हैं
तरस खा रहे हैं
पर हँस रहे हैं।
यह एक दृश्य है
जो हमारे समय के बिम्ब में बदल रहा है ।
Mon, 24 Aug 2026 - 1238 - Gh Ra | Arun Kumar Singh
घ र । अरुण कुमार सिंह
घर की याद में
घर का स्पर्श है
शब्दशः घ र
घ
र
घ
२
बुदबुदाते हुए
शरीर का स्पर्श करता हूँ
रेखाएं खोजती रहती हैं
रास्ता घर का
रेखाएं अंधी हैं
घर नहीं दिखता
आजकल बहुत चलता हूँ
खड़ा रहता हूँ
दूर तक देखता हूँ
घ
र
सबके सामने कपड़ों के भीतर
घ
र
नहीं टटोल पाता
कायर शब्द गले में मिलता है
उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ
चुपके से ढूंढता हूँ
घ
र
के बीच का हिस्सा
Sun, 23 Aug 2026 - 1237 - Dastak | Gulzar
दस्तक । गुलज़ार
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला'
देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
आँखों से मानूस थे सारे
चेहरे सारे सुने सुनाए
पाँव धोए, हाथ धुलाए
आँगन में आसन लगवाए
और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए
पोटली में मेहमान मिरे
पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे
आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था
और होंटों पर मीठे गुड़ का ज़ाइक़ा अब तक चिपक रहा था
ख़्वाब था शायद!
ख़्वाब ही होगा!!
सरहद पर कल रात, सुना है चली, थी गोली
सरहद पर कल रात, सुना है
कुछ ख़्वाबों का ख़ून हुआ था
Sat, 22 Aug 2026 - 1236 - Shraadh | Ashutosh Sharma
श्राद्ध - आशुतोष शर्मा
किसी चींटी को बचपन में कुचला था
केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता
छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को
किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या
झूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह
उपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल
बहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां
मारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर
पत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना
अग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म
गंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़
पीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्ण
संस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पाप
मृत्यु पर सिरहाने मेरे
पंजे जूते चप्पल
ककड़ पत्थर और छिपकलियां थी
किन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थे
चींटी बुलबुल केंचुए
भिखारी बस्ते उपेक्षित और झूले
कुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएं
किसी शास्त्रीय वर्जना के कारण
जीते जी नहीं आ सकते शमशान
उनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझ
नहीं उठा सकती मेरी आत्मा।
Fri, 21 Aug 2026 - 1235 - Ek Khwaish | Amrita Sinha
एक ख्वाहिश । अमृता सिन्हा
कभी कभी कुछ दूरियाँ अच्छी होती हैं,
जैसे आँखों से काजल की दूरी
कढ़ाही से करछी की दूरी
लेखक की कलम से दूरी
रचनाकार की रचनात्मकता से दूरी
प्रेमी की प्रेम से दूरी
अंतर्मन की गहराई में उतरने की ख़ातिर
बाहरी दुनियाँ से दूरी, सोंशल मीडिया से अवकाश
बाहरी कोलाहल से अलग-थलग
बनायी जाये कुछ दिनों की दूरी
रहा जाए एकदम ख़ामोश
बनाया जाये चुप्पियों का पहाड़
बिताया जाये कुछ दिन, मन की
चंचल फुदकती
गिलहरियों के साथ।
सारी दुनियाँ की क़तर-व्योंत से दूर
सिर्फ और सिर्फ मैं रहूँ
और रहे
सिर्फ़ अपना ख़्वाब।
Thu, 20 Aug 2026 - 1234 - Vismay Tarbooz Ki Tarah | Alok Dhanwa
विस्मय तरबूज की तरह । आलोकधन्वा
तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा
जब मैं उसके किनारों से वापस आया
वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं
जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा
वे जानवर
जो सुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे
और उन्हें इंतज़ार करना नहीं आता था
और वे पहले छाते
बादल जिनसे बहुत क़रीब थे
समुद्र मुझे ले चला उस दुपहर में
जब पुकारना भी नहीं आता था
जब रोना ही पुकारना था
जहाँ विस्मय
तरबूज़ की तरह
जितना हरा उतना ही लाल।
Wed, 19 Aug 2026 - 1233 - Indhan | Gulzar
ईंधन । गुलज़ार
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया !
Tue, 18 Aug 2026 - 1232 - Kitabein | Tanwir Sheikh Ilham
किताबें। तनवीर शेख़ 'इल्हाम’
किताबें पढ़ा करों
ये तार्किक बनाती हैं तुम्हें
और बनाती हैं मार्मिक तुम्हारे विचारों को
ताकि तुम अपने अधिकार को
अपने कर्तव्य को समझ सको, परख सको
किताबें पढ़ा करों
क्योंकि ये तुम्हें साँचे में ढालकर
तुम्हारे व्यक्तित्व को और अद्वितीय बनाती है
ठीक उस कुम्हार की तरह जो
खुरदुरी मिट्टी को साँचकर
उसका मोल बढ़ाते हैं
तो तुम पढ़ो किताबें
जितनी हो सके पढ़ो
ताकि तुम ख़ुद को जान सको
और जान सकों अपने हृदय की चाहत को
ताकि लड़कर जीत सकों उस समाज से
जिसने तुम्हें जकड़े रखा है
तो तुम पढ़ो...
और तब तक मत रुको
जब तक तुम उस आसमाँ को पा न लो
जो तुम्हारा ही है
और आत्मसात कर लो कि
ये किताबें क्रांति है
इसे पढ़ने वाला
इसे समझने वाला
और इसका प्रयोग करने वाला
हर एक मनुष्य क्रांतिकारी है!
Mon, 17 Aug 2026 - 1231 - Upeksha | Subhadra Kumari Chauhan
उपेक्षा । सुभद्राकुमारी चौहान
इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले॥
विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए॥
मेरी साँसों की लू से
कुछ आँच न उनमें आए।
मेरे अंतर की ज्वाला
उनको न कभी झुलसाए॥
कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने॥
इस भांति उपेक्षा मेरी
करके मेरी अवहेला
तुमने आशा की कलियाँ
मसलीं खिलने की बेला॥
Sun, 16 Aug 2026 - 1230 - Mujhe Teen Do Shabd | AgyeyaSat, 15 Aug 2026
- 1229 - Gawahi | Adnan Kafeel DarweshFri, 14 Aug 2026
- 1228 - Kashi Mere Kashi | Aishwarya Tiwari
काशी मेरे काशी । ऐश्वर्या तिवारी
मैं निरे शुन्य मैं बैठी
वो जब आया था तो शुन्य हुए आया था
हर बार कहता था -
मैं कुछ नहीं, कोई नहीं मैं।
हम मिलते
बैठते कई घंटों
फिर चले जाते,
एक दिन मिलते हुए मैंने कहा - साड़ी
और देखा उसे होते हुए बुनकर
जोड़-तोड़ कर ताना-बाना
बुनने लगा है साड़ी
परखने आ गया है उसे
धागों की बुनावट का सलीका।
मैंने कहा सीपियों वाले झुमके
उसे देखा समन्दर किनारे
बढ़ गई है उसकी यात्रा
थोड़ा और सीखने लगा है वो तैराकी
अब नहीं कहता कि डरता है वो बहते पानी से।
मैंने जैसे ही कहा भूख
वो था कहीं किसी खेत की मेड़ पर
अपना खुरपी कुदाल लिए
हाँकते हुए बैलों को
करते हुए अगले फसल के बुआई की तैयारी।
फिर मैंने जब कहा छाँव
उसे पेड़ होते पाया;
खुशबू के सुनते ही
मुझे उसका गुलाब, मोगरा, शिउली होना याद है।
मैंने कहा स्पर्श
और मुझे याद है उसका बच्चा होना
मेरे माथे को चूमना,
मैंने जब भी कहा दुःख
उसने गले लगाने में ज़रा देर नहीं की।
मैंने जैसे ही कहा इंतज़ार
उसे पहाड़ होना आ गया,
मेरे सफ़र कहते ही
बहने लगा वो नदी-सा कल-कल।
मैं जो-जो कहती गई
वो सो-सो होता गया
मैं जो बैठी थी शून्य में
वो जो कहता था - मैं कुछ नहीं, कोई नहीं हूँ
इसी तरह एक दिन
मैं कहूँगी काशी...
मेरे काशी..
और देखूंगी
कैसे होता है वो
अपने आप से मुक्त
और सिमट कर आ जाता है मुझमें
जैसे दुनिया की नाभि से काटकर
अंतिम बार लाए जाते हैं लोग मणिकर्णिका के घाट पर।
मेरा कहना और उसका होते जाना
मेरी इच्छाए और उसकी फ़क़ीरी
गुँथ जाएगी इस तरह
कि एक दिन वो कहेगा कुछ
और मैं होती जाउंगी उसके कहे अनुसार
हम हमारे बन्धन भी हैं
और हम ही हैं हमारी मुक्ति भी।
Thu, 13 Aug 2026 - 1227 - Parakhna Mat | Bashir Badr
परखना मत । बशीर बद्र
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता
मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता
तुम्हारा शहर तो बिलकुल नए अंदाज़ वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हम सा नहीं रहता
Wed, 12 Aug 2026 - 1226 - Kalam | Vishwanath Prasad Tiwari
कलम। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
कलम
उठाओ इसे
इसमें छिपा है
देवताओं-अप्सराओं का गान
अबोध शिशुओं की मुस्कान
यह भर सकती है फूलों में रंग
पानी में आग
और आग में थोड़ी-सी रोशनी
फेंको इसे तौलकर
शिलाखंड से फूट पड़ेंगे निर्झर
बह जाएँगे ब्रह्मास्त्र
यह दे सकती है
अनाम को नाम
अरूप को रूप
सन्नाटे को शब्द
मिटा सकती है
जंगल और समुद्र की लिपि
बना सकती है
धरती का व्याकरण
अगर तुम्हारी गफलत से
यह पड़ी रह गई अँधेरे में
तो धरती पर छा जाएगा अंधकार
दहाड़ने लगेंगे हिंस्त्र पशु
उठाओ इसे
सिसक रही है यह अँधेरे में असहाय
इसे चाहिए एक हाथ
जिसने वेद लिखा
और लोहा गलाया
इसे चाहिए एक हाथ
जो कभी मत लिखे उपसंहार
उपसंहार के लिए छोड़ जाए
इसे।
Tue, 11 Aug 2026 - 1225 - Nayi Nayi Aankhein Hon To | Nida Fazli
नई नई आँखें हों तो । निदा फ़ाज़ली
नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है
मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं
जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है
मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे
सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है
चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं
जो मूरत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है
हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है
नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
Mon, 10 Aug 2026 - 1224 - Dushwari | Javed Akhtar
दुश्वारी । जावेद अख़्तर
मैं भूल जाऊँ तुम्हें
अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कम-बख़्त
भुला न पाया वो सिलसिला
जो था ही नहीं
वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त
जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं
Sun, 09 Aug 2026 - 1223 - Hai Daiyya | Nilesh Raghuvanshi
हाय दैया । नीलेश रघुवंशी
एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी
कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए
माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी बिंदी
ओंठों पर लाली ठोड़ी पर सात टिकुली
काली धोती के संग चटक हरे रंग का पोलका
हाथ में गिलट के कड़े और बाजुबंद
गले में हँसली बजट्टी माथे पर गिलट की बेड़ी लगाए
कमर में करधौनी और पाँव में आयलें संग में आँवड़ा कड़ा भी
स्त्री के सिर पर टोकरी
टोकरी में फल हैं चमकदार और रंगीन
सचमुच की फल बेचने वाली
अगर इसे देख ले तो हँसेगी कितना
हाय दैया हाय दैया करते हो जाएगी लोट-पोट
अगर फलों की टोकरी लिए खड़ी हो जाए कोने में
तो क्या लगेगी वह भी इतनी लुभावनी और इतनी ही सुंदर
धत्-
झटक देगी सर को और कहेगी इसको बनाने वाले की मति फिर गई है
चौराहे पर मुझ जैसी कई हर दिन सिर पर टोकरी लिए बेचती हैं फल
जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को
भरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते
आग लगे ससुरों की हँसी ठिठोली को
मूँछोंबारों की मूँछें बर जाएँ हमीं को सजा लिए अपने घर में
हाय दैया..
Sat, 08 Aug 2026 - 1222 - Prem Ka Sparsh | Rabindranath Tagore | Translation - Hazari Prasad Dwivedi
प्रेम का स्पर्श । रवींद्रनाथ टैगोर
अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी
हे भुवन,
मैंने जब तक
तुम्हें प्यार नहीं किया था
तब तक तुम्हारा प्रकाश
खोज-खोजकर (भी) अपना सारा धन नहीं पा सका था!
उस समय तक
समूचा आकाश
हाथ में अपना दीप लिए हर सूनेपन में बाट जोह रहा था।
मेरा प्रेम गान गाता हुआ आया,
(फिर न जाने) क्या कानाफूसी हुई,
उसने डाल दी तुम्हारे गले में
अपने गले की माला!
मुग्ध नयनों से हँसकर
उसने तुम्हें
चुपचाप कुछ दे दिया,
(ऐसा-कुछ) जो तुम्हारे गोपन हृदय-पट पर
चिरकाल तक बना रहेगा, तारा-हार में पिरोया हुआ!
Fri, 07 Aug 2026 - 1221 - Ameeri Rekha | Kumar Ambuj
अमीरी रेखा - कुमार अम्बुज
मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है
और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ
ऐसा होता आया है, बावजूद इसके
कि कई चीज़ें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं
और कई बार आदमी होने की शुरुआत
एक आधी-अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा
या एक पोखर बन जाने से भी होती है
या जब सब रफ़्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरुआत है
बशर्ते मनुष्यता में तुम्हारा विश्वास बाक़ी रह गया हो
नमस्कार, हाथ मिलाना, मुस्कुराना, कहना कि मैं आपके
क्या काम आ सकता हूँ—
ये अभिनय की सहज भंगिमाएँ हैं और इनसे अब
किसी को कोई ख़ुशी नहीं मिलती
शब्दों के मानी इस तरह भी ख़त्म किए जाते हैं
तब अपने को और अपनी भाषा को बचाने के लिए
हो सकता है तुम्हें उस आदमी के पास जाना पड़े
जो इस वक़्त नमक भी नहीं ख़रीद पा रहा है
या घर की ही उस स्त्री के पास
जो दिन रात काम करती है
और जिसे आज भी मज़दूरी नहीं मिलती
बाज़ार में तो तुम्हारी छाया भी नज़र नहीं आ सकती
उसे दूसरी तरफ़ से आती रोशनी दबोच लेती है
वसंत में तुम्हारी पत्तियाँ नहीं झरतीं
एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है
कि तुम नश्वर नहीं रहे
तुम्हें यह देखने के लिए जीवित रहना पड़ सकता है
कि सिर्फ़ अपनी जान बचाने की ख़ातिर
तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो
जब लोगों को रोटी भी नसीब नहीं
और इसी वजह से साठ-सत्तर रुपए रोज़ पर तुम एक आदमी को
और सौ-डेढ़ सौ रुपए रोज़ पर एक पूरे परिवार को ग़ुलाम बनाते हो
और फिर रात की अगवानी में कुछ मदहोशी में सोचते हो
कभी-कभी घोषणा भी करते हो—
मैं अपनी मेहनत और क़ाबलियत से ही यहाँ तक पहुँचा हूँ।
Thu, 06 Aug 2026 - 1220 - Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke | Shivmangal Singh Suman
हम पंछी उन्मुक्त गगन के । शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाएँगे भूखे-प्यासे,
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से,
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले,
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने,
लाल किरण-सी चोंचखोल
चुगते तारक-अनार के दाने।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी,
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती साँसों की डोरी।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो,
लेकिन पंख दिए हैं, तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।
Wed, 05 Aug 2026 - 1219 - Ma | Padma Sachdeva
माँ । पद्मा सचदेव
बुलाने के लिए कई नाम हैं
जिसे पुकारो बोलता भी है
पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो
सब चौकन्ने हो जाते हैं
सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं
माँ... माँ... माँ...
ओ लड़के
ओ बेटा
वह मेरी बेटी
कहाँ मर गई हो
माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा
गली में से निकलता है
सड़क पार करता है
या पहाड़ चढ़ता है
पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है
तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह
खिल उठती है
दोनों दरवाज़े थाम कर देखती है
गलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते
माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं
माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं
मधुरता में नहला कर, चाव से भर कर
ज़रा-सा डर कर आतुरता से
माँ... माँ... माँ
बछड़ा रंभाता है बां बां बां
गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है
मालिक का कोई डर नहीं रहता
कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो
कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ
हाय बाप कोई नहीं कहता
Tue, 04 Aug 2026 - 1218 - Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt
दोनों ओर प्रेम पलता है। मैथिलीशरण गुप्त
दोनों ओर प्रेम पलता है।
सखि, पतंग भी जलता है
हां! दीपक भी जलता है।
सीस हिलाकर दीपक कहता -
’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
पर पतंग पड़ कर ही रहता
कितनी विह्वलता है
दोनों ओर प्रेम पलता है।
बचकर हाय! पतंग मरे क्या?
प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?
जले नहीं तो मरा करे क्या?
क्या यह असफ़लता है?
दोनों ओर प्रेम पलता है।
कहता है पतंग मन मारे-
’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,
क्या न मरण भी हाथ हमारे?
शरण किसे छलता है?’
दोनों ओर प्रेम पलता है।
दीपक के जलने में आली,
फिर भी है जीवन की लाली।
किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,
किसका वश चलता है?
दोनों ओर प्रेम पलता है।
जगती वणिग्वृत्ति है रखती,
उसे चाहती जिससे चखती;
काम नहीं, परिणाम निरखती।
मुझको ही खलता है।
दोनों ओर प्रेम पलता है।
Mon, 03 Aug 2026 - 1217 - Lipi | Hemant DeolekarSun, 02 Aug 2026
- 1216 - Barsaat Mubarak Ho | Meena Kumari 'Naaz'Sat, 01 Aug 2026
- 1215 - Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan
कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ । वाज़दा खान
केवल मिसाइलें ही गहरे
मारक असर नहीं करतीं
जीवन में और भी बहुत कुछ है
गहरा और असरदार
कभी उतरो जो उन गहराइयों में
जहां बेहद अन्धेरा है
कहीं है चिड़िया की एक आवाज़
कहीं चट्टानों के बीच दबा कोई रंग
कहीं दरारों में बिंधा रुदन
निश्चित रूप से हर असर
गहरा अन्धेरा नहीं होता
मगर जो गहरा और असरदार है उनमें से
कुछ सितारों के साथ, तो कुछ
दूसरे ग्रह के सूर्य के साथ
छप जाते हैं पानी से लेकर
उन हवाओं तक
जो पिछली सदी और उससे भी
पिछली सदी में और आज तक एक
जैसी है, पानी भी एक जैसा है
मगर कुछ है जो बदलता जा रहा है
तेज़ी से वक्त के साथ
देख पाती हूं आंखों के भीतर
चमकती धूप में पाती हूं तब
कुछ सच्चाइयां, कुछ झूठ, कुछ गणनायें
कुछ तथ्य, बहुत सारी चुप्पियां
और तबाह कर देने वाला
इक स्याह जुनून।
Fri, 31 Jul 2026 - 1214 - Mustanda Aur Bachcha | Shubha
मुस्टंडा और बच्चा। शुभा
भाषा के अंदर बहुत सी बातें
सबने मिलकर बनाई होती हैं
इसलिए भाषा बहुत समय
एक विश्वास की तरह चलती है
जैसे हम अगर कहें बच्चा
तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा
लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है
एक परजीवी
एक तानाशाह
फिर भी हम कहते रहते हैं—
बच्चा! ओहो बच्चा!
और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है
किसी उजड़े हुए बूढ़े में
किसी ठगी गई औरत में
किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में
छिपकर जान बचाता है बच्चा
अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है
इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है
भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ
Thu, 30 Jul 2026 - 1213 - Pukare Ja Rahe Ho Ajnabee Se | Zafar Gorakhpuri
पुकारे जा रहे हो अजनबी से । ज़फ़र गोरखपुरी
पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो
ख़ुद अपने शोर में गुम आदमी से चाहते क्या हो
ये आँखों में जो कुछ हैरत है क्या वो भी तुम्हें दे दें
बना कर बुत हमें अब ख़ामुशी से चाहते क्या हो
न इत्मिनान से बैठो न गहरी नींद सो पाओ
मियाँ इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से चाहते क्या हो
उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में
ये सब कुछ जान कर आवारगी से चाहते क्या हो
किनारों पर तुम्हारे वास्ते मोती बहा लाए
घरौंदे भी नहीं तोड़े नदी से चाहते क्या हो
चराग़-ए-शाम-ए-तन्हाई भी रौशन रख नहीं पाए
अब और आगे हवा की दोस्ती से चाहते क्या हो
Wed, 29 Jul 2026 - 1212 - Bin Gharni Ghar Bhoot ka Dhera | Abha BodhisattvaTue, 28 Jul 2026
- 1211 - Kehte Hain Taare Gaate Hain | Harivansh Rai Bachchan
कहते हैं, तारे गाते हैं! । हरिवंश राय बच्चन
कहते हैं, तारे गाते हैं!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!
स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!
ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!
Mon, 27 Jul 2026 - 1210 - Antim Sipahi Ki Tarah | Leeladhar Mandloi
अंतिम सिपाही की तरह । लीलाधर मंडलोई
मैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सका
मैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैं
मैं रस्मी मातम में शरीक़ नहीं
मैं उन आवाज़ों में हूँ जिनमें मुक्ति का गान गूँजता है
मैं उनके लिए अपनी घृणाओं को आकाश करना चाहता हूँ
मैं न्याय के लिए अंतिम सिपाही की तरह
जीत के लिए मर जाना चाहता हूँ।
Sun, 26 Jul 2026 - 1209 - Har Baar Deewaar | Jyotsna MilanSat, 25 Jul 2026
- 1208 - Main Dhoondhta Hun Jisey | Kaifi Azmi
मैं ढूँडता हूँ जिसे । कैफ़ी आज़मी
मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
Fri, 24 Jul 2026 - 1207 - Mujhko Tera Shabab Le Baitha | Shiv Kumar Batalvi
मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवी
अनुवाद: आकाश 'अर्श'
मुझ को तेरा शबाब ले बैठा
रंग, गोरा गुलाब ले बैठा
दिल का डर था कहीं न ले बैठे
ले ही बैठा जनाब ले बैठा
जब भी फ़ुर्सत मिली है फ़र्ज़ों से
तेरे रुख़ की किताब ले बैठा
कितनी बीती है कितनी बाक़ी है
मुझ को इस का हिसाब ले बैठा
मुझ को जब भी है तेरी याद आई
दिन-दहाड़े शराब ले बैठा
अच्छा होता सवाल ना करता
मुझ को तेरा जवाब ले बैठा
'शिव' को इक ग़म पे ही भरोसा था
ग़म से कोरा जवाब ले बैठा
Thu, 23 Jul 2026 - 1206 - Janamdin | Baby ShawWed, 22 Jul 2026
- 1205 - Apna Yatna Mein | Savita Singh
अपनी यातना में । सविता सिंह
वह सो चुकी थी कई नींदें
कई दिन और रातें बीत चुकी थीं
कई ज़िंदगियाँ बन और बिखर चुकी थीं इस बीच
लेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा था
जिसकी झालर को पकड़ वह उठी थी
और उन फूलों को ढूँढ़ने लगी थी
जिन्हें सीने से लगा वह सोने गई थी
जागने पर यह संसार उसे अब भी
बहुत जाना-पहचाना ही लगा था
फूल भले अनुपस्थित थे
लेकिन उसके प्रेमी वहाँ खड़े थे बाँहें फैलाए
हर हाल में प्रेम बचा रहता है उसने सोचा था
फिर आह्लादित हो ख़ुद से कहा था
आसमान को छत और धरती को बिस्तर बना
समुद्र की तरह कोई गीत गाना चाहिए
तभी उसका एक प्रेमी उसे बालों से पकड़
खींचता हुआ ले गया नींद और सपनों से बाहर
समेटे हुए अपने सीने में चुराए उसके सारे फूल
जहाँ सब कुछ नया था अपनी यातना में
Tue, 21 Jul 2026 - 1204 - Vismriti ka Phool | Gobind PrasadMon, 20 Jul 2026
- 1203 - Rone Wala Hi Gaata Hai | Gopaldas Neeraj
रोने वाला ही गाता है । गोपालदास नीरज
रोने वाला ही गाता है!
मधु-विष हैं दोनों जीवन में
दोनों मिलते जीवन-क्रम में
पर विष पाने पर पहले मधु-मूल्य अरे, कुछ बढ़ जाता है।
रोने वाला ही गाता है!
प्राणों की वर्त्तिका बनाकर
ओढ़ तिमिर की काली चादर
जलने वाला दीपक ही तो जग का तिमिर मिटा पाता है।
रोने वाला ही गाता है!
अरे! प्रकृति का यही नियम है
रोदन के पीछे गायन है
पहले रोया करता है नभ, पीछे इंद्रधनुष छाता है।
रोने वाला ही गाता है!
Sun, 19 Jul 2026 - 1202 - Karbala | Rajesh Joshi
कर्बला। राजेश जोशी
पानी पियो तो याद करो प्यास इमाम हुसैन की!
पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो बादलों कानदियों, तालाबों और समुंदरों का
शुक्रिया अदा करो समुंदरों कासमुद्रों का पानी पीने के काम न आए तो भी!
पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो कुम्हारों काजिन्होंने बनाए पृथ्वी की तरह गोल मटके
और बहुत सुंदर सुराहियाँ जिनकी गरदनेंसुंदर स्त्रियों की तरह पतली और लंबी हैं!
पानी पियो तो सोचो।काटी तो नहीं तुमने दूसरों की नहरें
किसी की प्यास के रास्ते में तुम यज़ीद तो नहीं?पानी पियो तो याद करो उस शख़्स को
तपते रास्तों में जिसने दियागुड़ और पानी
जिसने रास्तों में बिठाईं ठंडे पानी की सबीलेंउसका शुक्रिया अदा करो!
उसका भी जिसने कम से कम इच्छा कीप्याऊ लगाने की!
पानी पियो तो सोचोखारा तो नहीं हुआ है तुम्हारी आत्मा का जल
पानी पियो तो सोचो नन्हे अली असग़र के बारे मेंसोचो कहीं अंधे तीर में तो नहीं बदल गई है
तुम्हारी घृणा!Sat, 18 Jul 2026 - 1201 - Jharkhand Ke Pahadon Ka Aranyarodan | Gyanendrapati
झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन । ज्ञानेन्द्रपति
डबडबा आया है भुरुकवा
पूरब में भिनसार का भान है
चिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहले
अँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज है
वह कौन है
इस नीरव झारखण्ड में
अपने कलपने को
अपने भी कानों से दूर
हिरदै की मुट्ठी में कसे हुए?
वे छोटानागपुर के ठिगने पहाड़ हैं
यहाँ के काले दुबले हड़ियल बूढ़े
आदिवासियों की तरह ही चुप्पा कठिन
नए दिन के लिए वे तैयार कर रहे हैं ख़ुद को
अब आएँगे पर्वतों के पंख काटने वाले वज्रधर इन्द्र के वंशज
अपनी फटफटिया में भड़भड़िया में
और फटाफट धड़ाधड़
चालू हो जाएँगे क्रशर
बारूद की गन्ध फैल जाएगी हवा में
उनके टूटने की गन्ध के ऊपर
और वे बोल्डरों में गिट्ठियों में खण्ड-खण्ड हो जाएँगे
चौड़े पंजरों वाले ट्रकों के पेट
टायरों की हवा तक भरते जाएँगे जल्दी-जल्दी
और धीरे-धीरे चमक बढ़ती जाएगी
उन चेहरों पर
जिनकी जेब में उन्हें तोड़ने का पट्टा है
यानी एक मुहर लगा बेमतलब-सा पर मतलबी कागज़
और ख़ुश जो मन ही मन कहेंगे
आज ठर्रा नहीं, विलायती चलेगी
एक नया दिन
कि पुराना दिन
है इन प्राचीन पहाड़ों के सामने
तेज़ हवाओं में जिनकी ठोस काया में भीतर ही भीतर
अभी भी बज उठता है मैग्मा-धरती का वह मूल द्रव्य-जलतरंग-सा
जिनकी आग्नेय चट्टानें
धरती की प्राचीनतम रचनाएँ हैं
हिमालय के पर्वत-वलय जिनके बच्चे-बुतरू
धुँधली आँखें उठाए नेह से निहारते हैं वे।
भुकम्प-तरंगें छोड़ती एड़ियाँ उचका नभ में उठते
हिमालय के वर्फीले-गर्वीले शिखरों के युवमाथ
सत्तर करोड़ वर्षों का समय पसरा हुआ है
उनकी काली घिसी हुई देह में
वे पर्वतकुल के आदि पुरुष हैं
बस सात करोड़ वर्ष हुए हैं, इनके कुल-खुँट में
उगी थी हिमालय की कोंपल
विन्ध्याचल तब नाच-नाच उठा था मगन
अरावली पर्वत-मालाओं ने गाए थे सोहर
आशीष दिया था इन पठारों से
आदिपर्वतों ने
ये वही पुरखे पहाड़ हैं जिनके हाड़
आज लालची मानव-गिद्धों का भोजन-भर
पूरब में
डबडबा आया है भुरुकवा
कि जैसे वह छोटानागपुर के छीजते जंगलों, मिटती वनस्पतियों, खंखुरते खनिजों की
आँख हो
कि क्या धरा है भू में
इन भूधरों की छाँह के गुज़र जाने के बाद
बस आतप और बिपत ।
Fri, 17 Jul 2026 - 1200 - Phir Kahe Ki Dooriyan | Anwar Suhail
फिर काहे की दूरियाँ । अनवर सुहैल
देखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी की
मिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों कीतुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा आ जाती
और अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिएकहते मुझे जनाब की जगह ‘ख़ुदा-हाफ़िज़’
जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिट्टी की उपज हूँउतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुम
फिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरहमैं कोई एलियन नहीं हूँ भाई
खान-पान, बरत-त्यौहार, रीत-रिवाज अलग होते हुए भीकितने एक से हैं...देखो न,
बेटियाँ बिदा के वक़्त रोती हैं तुम्हारे यहाँऔर भर आती हैं आँखें लड़के वालों की भी
हमारे यहाँ भी तो ऐसा ही होता है भाईफिर काहे का अंतर...
फिर काहे की दूरियाँ...Thu, 16 Jul 2026 - 1199 - Mitti Ki Kaaya | Vishwanath Prasad TiwariWed, 15 Jul 2026
- 1198 - Tope | Viren Dangwal
तोप । वीरेन डंगवाल
कंपनी बाग़ के मुहाने पर
घर रखी गई है यह 1857 की तोप
इसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिले
कंपनी बाग़ की तरह
साल में चमकाई जाती है दो बार
सुबह-शाम कंपनी बाग़ में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिए थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में
अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फ़ारिग़ हो
तो उसके ऊपर बैठ कर
चिड़ियाँ ही अक्सर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ास कर गौरैयें
वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उसका मुँह बंद
Tue, 14 Jul 2026 - 1197 - Zara Zara Sa | Sunita JainMon, 13 Jul 2026
- 1196 - Yehi hai Saadgi | Pablo Neruda | Translation - Prabhati NautiyalSun, 12 Jul 2026
- 1195 - Abhida Ki Ek Sham | Vivek Nirala
अभिधा की एक शाम। विवेक निराला
एक छोटी शाम जो
लम्बी खिंचती जाती थी
बिल्कुल अभिधा में।
रक्ताभा लिए रवि
लुकता जाता था।
लक्षणा के लद चुके
दिनों के बाद
अभिधा की एक छोटी-सी शाम
धीरे-धीरे
करती रही अपना प्रसार
बढ़ती जाती थी भीड़
सिकुड़ता रहा सभागार।
रचना ही बचना है
कोहराम मचना है-
कहा कभी किसी ने
बे दांत जबड़ों के बीच
कुतरे जाते हुए।
अहंकार से लथपथ
शतपथी ब्राहम्णों के
पान से ललाये मुख
से होते हुए आख़िर
पेट में जा पचना है।
आयताकार प्रकाश पुंज
फैला है भीतर
बाहर शाम को
लील रहा अंधकार
मंच पर आसीन
पहने कौपीन
लकदक लिये घातक हथियार
आतुर थे करने को एकल संहार।
वायु-मार्ग से आये
ऋषिगण करते आलोचन
लोहित लोचन।
थके चरण वह वधस्थल
को जाता उन्मन नतनयन।
माला और दुशाला को
डाला एक कोने में:
वध के पश्चात रक्त
सहेज कर भगोने में,
तेज़ धार वह कटार
पोंछ-पाछ साफ़ कर
अन्तिम यह वाक्य कहा-
"हल्का है, बासी है कल का है,
डिम्ब है न बिम्ब है
अभिधा है, अभिधा है
अग्नि को जो अर्पण है
मेरी प्रिय समिधा है।"
Sat, 11 Jul 2026 - 1194 - Prakriya | Kedarnath Singh
प्रक्रिया । केदारनाथ सिंह
मैं जब हवा की तरह
दृश्यों के बीच से गुज़रता हुआ
अकेला होता हूँ
तो क्षण भर के लिए
मुझे कहीं भी देखा जा सकता है
किसी भी दिशा से
किसी भी मोड़ पर
किसी भी भाषा के अज्ञात
शब्दकोश में
पर मैं
जब कहीं नहीं होता
सिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश में
सामने की भीड़ को
दूर से पहचानता हुआ
हवा के आर-पार
एक प्रश्न उछालता हूँ
और हँसता हूँ
तो न जाने क्यों
मुझे लगता है
कि गूँज-हीन शब्दों के इस घने अंधकार में
मैं—
अर्थ-परिवर्तन की
एक अबूझ प्रक्रिया हूँ
जिसके भीतर
ये लोग
झाड़ियाँ
बत्तख़ें और भविष्य
हर चीज़ एक-दूसरे में
घुली-मिली है
जड़ें रोशनी में हैं
रोशनी गंध में,
गंध विचारों में
विचार स्मृतियों में,
स्मृतियाँ रंगों में...
और मैं चुपचाप
इस संपूर्ण व्यतिक्रम को
भीतर सँभाले हुए
चलते-चलते
झुककर
रास्ते की धूल से
एक शब्द उठाता हूँ
और पाता हूँ कि अरे
गुलाब!
Fri, 10 Jul 2026 - 1193 - Vismriti | Sushma Kumari
विस्मृति। सुषमा कुमारी
हम दूसरी दुनिया के
चौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे के
बचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं,
आधे गेहूँ और आधे घून की तरह
बची हुई हमारी नियति
जातें में पीसने को तैयार है!
गेहूँ है, घून है
चक्की है, आटा है,
भूख अब भी बैठी है आँत में
हवा बदली है, मौसम बिगड़ा है।
अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं,
चूल्हे का सवाल
इन दिनों सबसे बड़ा सवाल है!
और चूहेदानी में फंसे
रोटी के टुकड़े सबसे बड़ा जाल है!
पत्थर से आग
और आग से चूल्हा जलाने वाले लोग
इन दिनों विस्मृति का शिकार हैं!
Thu, 09 Jul 2026 - 1192 - Sau Sau Janam Pratiksha Kar Lun | Bharat Bhushan
सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ। भारत भूषण
सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो!
पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ
फूट पडे पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो!
रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला
जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो!
सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी
साँसों की ज़ंजीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो!
Wed, 08 Jul 2026 - 1191 - O Achchi Ladkiyon | Pratibha Katiyar
ओ अच्छी लड़कियों | प्रतिभा कटियार
ओ अच्छी लड़कियो,
तुम मुस्कुराहटों में सहेज देती हो दुःख
ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर
जब बोलना चाहती हो दिल से
तो बाँध लेती हो बतकही की पाजेब
नाचती-फिरती हो
अपनी ही ख़्वाहिशों पर
और भर उठती हो संतोष से
कि ख़ुश हैं लोग तुमसे
ओ अच्छी लड़कियो,
तुम अपने ही कंधे पर ढोना जानती हो
अपने अरमानों की लाश
तुम्हें आते हैं हुनर अपनी देह को सजाने के
निभाने आते हैं रीति-रिवाज, नियम
जानती हो तुम कि तेज़ चलने वाली और
खुलकर हँसने वाली लड़कियों को
ज़माना अच्छा नहीं कहता
तुम जानती हो कि तुम्हारे ही अच्छे होने पर टिका है
इस समाज का अच्छा होना
ओ अच्छी लड़कियो,
तुम देखती हो सपने में कोई राजकुमार
जो आएगा और ले जाएगा किसी महल में
जो देगा ज़िंदगी की तमाम ख़ुशियाँ
सँभालोगी उसका घर परिवार
उसकी ख़ुशियों पर निसार दोगी ज़िंदगी
बच्चो की खिलखिलाहटों में सार्थकता होगी जीवन की
और चाह सुहागन मरने की
ओ अच्छी लड़कियों
तुम थक नहीं गयीं क्या अच्छे होने की सलीब ढोते ढोते
सुनो, उतार दो अपने सर से अच्छे होने का बोझ
लहराओ न आसमान तक अपना आँचल
हँसो इतनी तेज़ कि धरती का कोना-कोना
उस हँसी में भीग जाए
उतार दो रस्म-ओ-रिवाज़ के ज़ेवर
और मुक्त होकर देखो संस्कारों की भारी-भरकम ओढ़नी से
अपनी ख़्वाहिशों को गले से लगाकर रो लो जी भर के
आँखों में समेट लो सारे ख़्वाब
जो डर से देखे नहीं तुमने अब तक
ओ अच्छी लड़कियों,
अब किसी और का नहीं
सँभालो सिर्फ़ अपना मान
बेलगाम नाचने दो अपनी ख़्वाहिशों को
और फूँक मारकर उड़ा दो सीने में पलते
सदियों पुराने दुःख को
पहन के देखो
लोगों की नाराज़गी का ताज एक बार
और फोड़ दो अच्छे होने का ठीकरा
ओ अच्छी लड़कियों!
Tue, 07 Jul 2026 - 1190 - Auratein Kaam Karti Hain | Shubha
औरतें काम करती हैं । शुभा
चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की
दुनिया के बाहर
मालिकों की दुनिया के बाहर
पिताओं की दुनिया के बाहर
औरतें बहुत से काम करती हैं
वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती हैं
आटे को रोटी में
कपड़े को पोशाक में
और धागे को कपड़े में बदल देती हैं
वे खंडहरों को
घरों में बदल देती हैं
और घरों को कुएँ में
वे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैं
और तमाम चीज़ें सँवार देती हैं
वे बोलती हैं
और कई अंधविश्वासों को जन्म देती हैं
कथाएँ और लोकगीत रचती हैं
बाहर की दुनिया के
आदमी को देखते ही
औरतें ख़ामोश हो जाती हैं।
Mon, 06 Jul 2026 - 1189 - Laut Te Nahi Pita | Kumar Divyanshu Shekhar
लौटते नहीं पिता । कुमार दिव्यनशु शेखर
नीम-अँधेरे घर से निकले पिता
अँधेरे से पहले लौट आने की बात दोहरा के।
लौटी एक ख़बर
लौटा एक एम्बुलेस।
नीम-अँधेरे निकले पिता
फिर नहीं लौटे।
स्मृतियाँ लौट आती हैं
बार-बार
लौट आती हैं हिदायतें
लौटता है चेहरा
आँखों को बाँह ढाँपे लौट आता है सावन
लौटती है गंगा की धारा
गाय के नाँद में चारा
बारिश की नालियाँ-भुट्टों में बालियाँ
तुलसी का पत्ता-बया का जत्था
भोर की ओस
बेठोस
लौट आती है।
तारीख लौट आती है
लौटते नहीं पिता।
Sun, 05 Jul 2026 - 1188 - Hulchal | Anurag Tiwari
हलचल। अनुराग तिवारी
तेज़ कुछ भी हो सकता है
किंतु
सबसे तेज़ क्या है
चीते की चाल
बाज़ की नज़र
नहीं।
सबसे तेज़ हलचल होती है
जैसे आज एक हलचल हुई,
मेरी आहट से दीवार पर चिपकी छिपकली
कोने में घुस गई।
सबसे तेज़ हलचल
शेयर बाज़ार में नहीं होती!
एक्ज़िट पोल में भी हलचल तेज़ नहीं होती!
भारत पाक मैच में दिन भर हलचल रहती है
लेकिन सबसे तेज़ नहीं।
सबसे तेज़ हलचल
उस चेतना में होती है
जिसे भ्रम था सदैव स्वतंत्र रहने का!
सबसे तेज़ हलचल
उस राष्ट्र की भूमि में होती है
जिसे वरदान था अखण्ड होने का
जो सदा उर्वर रही वासियों के पोषण को!
सबसे तेज़ हलचल
उस पेट में होती है
जिसके चूहे आख़िरी साॅंस तक कूदने के बाद
अब मर चुके हैं!
सबसे तेज़ हलचल
उस हिरण की आंखों में होती है
जिसने देख लिया है बाघ
दूर से!
सबसे तेज़ हलचल
उस स्त्री की धड़कन में होती है
जिसने बाघ नहीं देखा
किंतु देख लिया है एक जानवर
जो मांस नहीं खाता
ख़ून नहीं पीता
हड्डियां भी नहीं चूसता
वह चमड़ियो को कूरेदता हुआ
नष्ट कर देता है आपकी आत्मा से
'आबरू' जैसा कोई शब्द!
Sat, 04 Jul 2026 - 1187 - Bacha Rahe Humare Beech Ka Ishwar | Arun Kumar Singh
बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर । अरुण कुमार सिंह
तुम जागती करवटों से लिखते हो कोई नाम
सुबह चादर बूँद-बूँद निचोड़ती है अपनी पीड़ा
बहेलिए ने मारा फिर कैद की
एक चिड़िया
जिसके पेट में मिली थी प्रेम कविता
उसे क्रांति की कविता भी कहा गया।
जिस रात ठंड को याद कर चादर ओढ़ी थी,
गर्मी बहुत थी और हम पसीने से तरबतर।
ये कैसी त्रासदी जी रहे हैं हम,
पास बने रहने के लिए दूर जाना ज़रूरी
जिन रातों में कुछ नहीं लिखा तुमने
जीवन लिख रहा था तुम्हारे माथे पर अपनी कविता।
कोई किसी की पीठ पर सिर टिकाकर करता है प्रार्थना
कि उनके बीच का ईश्वर बचा रहे।
कितना कुछ छिपा रहता है शब्दों की चुप्पी के भीतर
किसी दिन झाडू लेकर बु्हार देंगे सारे शब्द
और बटोर लेंगे चुप्पी
किसी लिपिवादक को बुलाकर अनुवाद कराना उसका।
पलकों की सलवटों में सांप बसने लगें
तो ज़हरीली दिखती है दुनिया।
रक्षक बनने की प्रवृत्ति के दोषी हैं हम, सखी
क्या एक दिन ख़ुद ही के बनाए संकट में डालकर
एक दूसरे को बचाने का खेल खेलेंगे हम?
और हार जायेंगे सारी बाज़ी।
तुम्हारे ईश्वर की मूर्ति में दरार दिखेगी,
तो क्या अपने आंसुओं से भरोगे उसे?
सुनो, हारने से ठीक पहले रख देना
मेरे माथे पर अपना माथा
हम आखिरी प्रार्थना फिर करेंगे,
कि बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर।
Fri, 03 Jul 2026 - 1186 - Chaton Par Ladkiyan | Alok Dhanwa
छतों पर लड़कियाँ । आलोक धन्वा
अब भी
छतों पर आती हैं लड़कियाँ
मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।
गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए
जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं
नाले के ऊपर बनी सीढ़ियों पर और
फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर
चाय पी रहे हैं
उस लड़के को घेर कर
जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर
आवारा और श्री 420 की अमर धुनें।पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान
सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं।
उनमें सभी छात्र नहीं हैं
कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,
और कुछ लफंगे भीलेकिन उन सभी के ख़ून में
इंतज़ार है एक लड़की का !
उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से
किसी शाम प्यार आयेगा !Thu, 02 Jul 2026 - 1185 - Hoke Mayoos Na Yun Sham Se Dhalte Rahiye | Kunwar Bechain
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए। कुंवर बेचैन
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए
ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए
एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जाएँगे
धीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिए
आप को ऊँचे जो उठना है तो आँसू की तरह
दिल से आँखों की तरफ़ हँस के उछलते रहिए
शाम को गिरता है तो सुब्ह सँभल जाता है
आप सूरज की तरह गिर के सँभलते रहिए
प्यार से अच्छा नहीं कोई भी साँचा ऐ 'कुँवर'
मोम बन के इसी साँचे में पिघलते रहिए
Wed, 01 Jul 2026 - 1184 - Stree Ki Neend | Nilesh Raghuvanshi
स्त्री की नींद। नीलेश रघुवंशी
एक छोटे से डाकखाने में
वो स्त्री अपनी सीट पर इतनी उदास इतनी अकेली
समय उसके आसपास नहीं होता ऊँघते और झपकियाँ लेते
एक ही गलती को दोहराती है बार-बार कंप्यूटर पर
काउंटर पर ठक-ठक की आवाज़
नींद और आलस से बाहर लाती है उसे
वह लिफाफे की इबारत और भेजने वाले के
हाथों के कंपन से होती है कोसों दूर
नींद से भरी हुई इस स्त्री को देख
दफ्तर के लोग पीटते हैं सिर कोसते हैं अपने बीच उसके होने को
घर और दफ्तर के कभी न खत्म होने वाले कामों के बीच
स्त्री की नींद कसमसाती है
Tue, 30 Jun 2026 - 1183 - Parantu | Kumar Ambuj
परंतु । कुमार अम्बुज
बुद्धिजीवी भी सड़क पर आ सकते हैं
परंतु क्या करें यह सरकार ठीक नहीं है
माना कि यह लोकतंत्र है
और हम सुधारना चाहते हैं यह समाज
परंतु इधर ठाकुरों के वोट बहुत हैं
बेचारा ज़िला दंडाधिकारी भी
करना तो चाहता है कुछ हस्तक्षेप
परंतु उसके अधिकारों में भी
निर्बल को ही दंडित कर सकना सीमित है
कहते हैं कि इस देश में कई लोग हैं दयालु
परंतु उनकी संपन्नता से
ज़ाहिर हो जाती है उनकी क्रूरता
यों तो मैं ख़ुश हूँ
परंतु मुझे शर्म आती है
अपनी समकालीन कायरता पर
मैं शब्दों से काम चलाता हूँ
परंतु मुझे अब कुछ दूसरे औज़ार भी लगेंगे
परंतु संकल्प की कृशकाया
नामालूम खाई की तरफ़ लिए ही चली जाती है
विचार मेरे पास श्रेष्ठ है
परंतु पराजित होता हुआ
रोज़-रोज़ वह अल्पसंख्यक होता जाता है
सोचता हूँ उसे रखना होगा जीवित
परंतु हम सबको मिल कर ही
जो धीरे-धीरे अब बहुत अकेले हैं।
Mon, 29 Jun 2026 - 1182 - Kitab Ke Phool | Tanwir Sheikh 'Ilham'
किताब के फूल । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’
जब भी
अपने प्रेमिका को
देना गुलाब
देना संग किताबें भी
ताकी उन किताबों में
उस गुलाब को संजो सके
तुम्हारे दिए खतों को
उस किताब के पन्नों में छुपा सके
और आजीवन के लिए
इस पल को अपने स्मृति में सहेज सके
वो जब-जब उस किताब को पढ़े
तो उस गुलाब की ख़ुश्बू
तुम्हारे होने का साक्षी बनेंगी
और उसे यादों में ले जाएंगी
जो उसे पुलकित करेंगें
ये किताबें
तुम्हारे प्रेम को जीवित रखने का
कर्तव्य निभाती रहेगी
और सहेजे रखेगी तुम्हारे स्मृतियों को
तो जब भी देना गुलाब
देना संग किताबें भी..!
Sun, 28 Jun 2026 - 1181 - Swaron Ka Samarpan | Shrikant Verma
स्वरों का समर्पण । श्रीकांत वर्मा
डबडब अँधेरे में, समय की नदी में
अपने-अपने दिये सिरा दो;
शायद कोई दिया क्षितिज तक जा,
सूरज बन जाए!!
हरसिंगार जैसे यदि चुए कहीं तारे,
अगर कहीं शीश झुका
बैठे हों मेड़ों पर
पंथी पथहारे,
अगर किसी घाटी भटकी हों छायाएँ,
अगर किसी मस्तक पर
जर्जर हों जीवन की
त्रिपथगा ऋचाएँ;
पीड़ा की यात्रा के ओ पूरब-यात्री!
अपनी यह नन्हीं-सी आस्था तिरा दो
शायद यह आस्था किसी प्रिय को
तट तक ले जाए!!
Sat, 27 Jun 2026 - 1180 - Deewar | Saqi FarooquiFri, 26 Jun 2026
- 1179 - Ichhayein | Asteek VajpeyiThu, 25 Jun 2026
- 1178 - Zindagi Jab Bhi Teri Bazm Mein | Shahryar
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें । शहरयार
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें
सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें
दिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमें
याद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी से
रात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमें
हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें
Wed, 24 Jun 2026 - 1177 - Milan | Bharat Bhushan AggarwalTue, 23 Jun 2026
- 1176 - Diya | Om Prakash Valmiki
दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि
कच्चे घर में
जलते दीए की रोशनी पर
क़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।
लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।
जो पर्त दर-पर्त
कालिख पोत रहा है
दीवार पर,
नीचे गहरा अँधेरा है
जिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैं
हज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।
मेरी पिंडलियों
और भुजाओं के माँस से बनी हैं बाती
हड्डियों को निचोड़कर
निकाला गया है तेल।
अँधेरे में,
कालिख पुता मेरा जिस्म
जिसे तुमने अपवित्र
घोषित कर दिया
तिल-तिल जल रहा है
तुम्हें रोशनी देने के लिए।
किंतु इतना याद रखो
जिस रोज़ इंकार कर दिया
दीया बनने से
मेरे जिस्म ने
अँधेरे में खो जाओगे
हमेशा-हमेशा के लिए।
Mon, 22 Jun 2026 - 1175 - Mobile | Manglesh Dabral
मोबाइल । मंगलेश डबराल
वे गले में सोने की मोटी जंज़ीर पहनते हैं
कमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे एक आधे अँधेरे और आधे उजले रेस्तराँ में घुसते हैं
और खाने और पीने का ऑर्डर देते हैं
वे आपस में जाम टकराते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
उनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसी
चाँदी जैसा या रहस्यमय नीला
उनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षक
वे अपने नए मोबाइलों को अपनी नई प्रेमिकाओं की तरह देखते हैं
और उन पर बात करते हैं
वे एक-दूसरे के मोबाइल हाथ में लेकर खेलते हैं
और उनकी विशेषताओं का वर्णन करते हैं
वे एक अँधेरे-उजले रेस्तराँ में घुसते हैं
और ज़्यादा खाने और ज़्यादा पीने का ऑर्डर देते हैं
वे धरती का एक टुकड़ा ख़रीदने का ऑर्डर देते हैं
वे जंगल पहाड़ नदी पेड़
और उनमें दबे खनिज को ख़रीदने का ऑर्डर देते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे पता करते रहते हैं
कहाँ कितना खा और पी सकते हैं
कहाँ कितनी संपत्ति बना सकते हैं
वे पता करते रहते हैं
धरती कहाँ पर सस्ती है खाना-पीना कहाँ पर महँगा है
वे फिर से एक अँधेरे-उजले रेस्तराँ में बैठते हैं
और सस्ती धरती और महँगे खाने-पीने का ऑर्डर देते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे फिर से अपनी जंज़ीरें ठीक करते हैं बेल्ट कसते हैं
वे अपने मोबाइलों को अपने हथियारों की तरह उठाते हैं
और फिर से कुछ ख़रीदने का आर्डर देने चल देते हैं।
Sun, 21 Jun 2026 - 1174 - Ve Kaise Din The | Kirti Chowdhary
वे कैसे दिन थे। कीर्ति चौधरी
वे कैसे दिन थे
जब चीज़ें भागती थीं
और हम स्थिर थे
जैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुए
ओझल होते थे दृश्य
पल के पल में—
...कौन थी यह तार पर बैठी हुई
बुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ?
आसमान को छूता हुआ
सवन का जोड़ा था?
दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करती
नदिया थी?
या रेती का भ्रम?
कभी कम कभी ज़्यादा
प्रश्न ही प्रश्न उठते थे
हम विमूढ़ ठगे-से
सुलझाते ही रहते
और चीज़ें हो जाती थीं ओझल
वे कैसे दिन थे
जो रहे नहीं।
सीख ली हमने चाल समय की
भागने लगे सरपट
बदल गए सारे दृश्य
शाखों पर दुबकी भूरी चिड़ियों ने
कुतूहल से देखा हमें
हवा ने बढ़ाई बाँह
रसभीनी गंधमयी
लेकिन हम रुके नहीं
हमने सुनी ही नहीं
झरनों की कलकल
ताड़ पत्रों की बाँसुरी
पोखर में खिले रहे दल के दल कमल
और मुरझाए-से हम
आगे और आगे
भागते ही रहे
छोड़ते चले ही गए
जो कुछ पा सकते थे
हाथ रही केवल
यही अंतहीन दौड़
और छूटते दिनों के संग
पीछे सब छूट गया।
Sat, 20 Jun 2026 - 1173 - Hey Meri Uttara | Ashutosh Sharma
हे मेरी उत्तरा! । आशुतोष शर्मा
मेरे शस्त्र की धारमयी रति को
तुम्हारी भाषा के वैराग्य ने छीन लिया था
हे मेरी उत्तरा!
मेरे रण में जाने से पूर्व
तुम्हारे ऑँचल का सतीत्व
मुझे आगाह कर रहा था
एक भयंकर सामूहिक पाप के प्रति
मेरे मातुल की वंशी से
एक मौन भाप की ध्वनि आ रही थी
गांडीव अपने चरण मुझसे दूर हटा रहा था
आधा सा लग रहा था पिता भीम का आश्वासन
है मेरी उत्तरा!
तुम्हारे बाल वैधव्यता से
कुरुक्षेत्र के मंडप में होगा मेरा विवाह
मैं यह जानता था कि
धर्मक्षेत्र मेरी शोणित के योगदान का आकांक्षी है।
इतिहास मेरी वीरता का आनन्द लेना चाहता है।
हे मेरी उत्तरा!
हमारे प्रेम का साहित्य
छंदबद्ध नहीं है
असंकलित, अज्ञात कहीं
मेरे मस्तक की भांति
जयद्रथ के पैरों तले
या सेनापतियों के विजयी रथों के नीचे
सिपाहियों के शर्वों सा
इतिहासहीन पड़ा है
गौरव करने वाली जातिर्यों का सच
कलम का सौदा करने वाले घातियों ने खा लिया है
हे मेरी उत्तरा!
चक्रवर्तियों की सभा में
पासों से तुम्हारी नियति को न खेल जाए कोई राजवंश
तुम्हारा दाव पर लग जाना
मेरे पौरुष पर घाव सा न लग जाए
इसी चिन्ता का नाम महाभारत है।
हे मेरी उत्तरा!
अपने ललाट का सिन्दूर
मेरे भीगे पीताम्बर से पोंछना
संभवतः तुम्हारी माँग की अरुणिमा में और वृदधि हो जाय
व मेरा बलिदान कहीं और गौरवशाली
और पुकारूं मैं तुम्हें
निर्जीव पड़े श्रृंगारों से
हे मेरी संगिनी!
हे मेरी अर्धागिनी!
हे मेरी वीरांगना!
हे मेरी उत्तरा!
हे मेरी उत्तरा!
हे मेरी उत्तरा!
Fri, 19 Jun 2026 - 1172 - Ladna | Pawan Karan
लड़ना। पवन करण
मुझे उन सबकी ख़ूब याद आती है
जिन्होंने मुझसे कई बार कहा
कि मुझे लड़ना चाहिए
मैं उन सबको कभी भूल नहीं पाता
जो मुझसे हमेशा कहते रहे कि मुझे
लड़ने से डरना नहीं चाहिए
मैं उनसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ
जिन्होंने मुझसे कहा कि मैं ही
नहीं लड़ूँगा तो फिर कौन लड़ेगा
मैंने उनकी मानी होती
तो मैं भी लड़कर हारा होता
Thu, 18 Jun 2026 - 1171 - Pahadi Baccha | Nirmala Putul
पहाड़ी बच्चा । निर्मला पुतुल
पहाड़ की गोद में
पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों सा
खेलता है पहाड़ी बच्चा
लड़खड़ाते कदमों से पहाड़ चढ़ते
रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव
पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह
पूरी ताकत से होने के लिए
पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है
पूरा का पूरा पहाड़,
और पहाड़ों की गोद में होता है
दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,
पहाड़ी बच्चा देखता है
पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़
और पूछता है पिता से
उस नए पक्षी के बारे में
उस नए पक्षी के बारे में
उस नए पक्षी के बारे में।
Wed, 17 Jun 2026 - 1170 - Chupke Se Idhar Aa Jao | ShahryarTue, 16 Jun 2026
- 1169 - Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire
इब्ने इंशा । स्वानंद किरकिरे
हम इंशा जी के चेले हैं
हम जोगी हैं बैरागी हैं
हम प्रीत प्रेम के प्यासे हैं
हम फ़ितरत से अनुरागी हैं
इंशा की लय पर लिखते हैं
कुछ उनकी तरह ही दिखते हैं
इंशा की तरह हम प्रेमी हैं
इंशा की तरह हम बाग़ी हैं
है चाँद से अपना याराना
है मन उसका आना-जाना
जिस शै से हमारा दिल है लगा
वो चाँद-चाँद कहलाती है
हज़ारों रातें चाँद हज़ार
हर शब है मोहब्बत का बाज़ार
हम जीते हैं अजी ऐसे ही
हमें चाँद लगन जो लागी है
इस शब का चाँद तो आधा है
इसे कम कह दें या ज़्यादा है
इस चाँद के आगे पूनम है?
या आगे इसके अमासी है?
हम अंधी शब में जी लेंगे
हम मन में चाँद दरस लेंगे
हम इंशा जी के चेले हैं
हमें कविता गढ़नी आती है
इंशा जी, कविता जीवन है?
या जीवन कविता है, कह दो
ये जो भी है इसे जी लो जी...
जिसे जैसी समझ में आती है
बड़ा ध्यान लगा कर हमने सुनो
जीवन की कविता बाँची है
अपने घर नौ मन तेल है जी
अपने दर राधा नाची है।
Mon, 15 Jun 2026 - 1168 - Shareef Log | Abdul Bismillah
शरीफ़ लोग । अब्दुल बिस्मिल्लाह
पत्थर के कोयले से
जो धुआँ उठता है
उसमें एक शहर महकता है
सुना है उस शहर में
शरीफ़ लोग रहते हैं
लेकिन
शराफ़त का
धुएँ से क्या नाता है
यह समझ में नहीं आता
जैसे यह
कि हर बार जंगल का राजा
शेर ही क्यों हो जाता है
या यह
कि बच्चों की फ़सल
मुरझाने क्यों लगी है
कि बिना किसी बीमारी के
मेरा जिस्म
तलवार क्यों हो रहा है
क्या यह बात
शरीफ़ों के कर्त्तव्य से बाहर है
कि वे धुएँ को ख़त्म करें
अथवा
पत्थर को जलने से रोकें
मैं समझता हूँ
इतना ही नहीं
जंगल का राज्य
बच्चों की फ़सल
मेरा जिस्म
सबके प्रति उनकी ज़िम्मेदारी है
अगर शहर में
सचमुच शरीफ़ लोग रहते हैं।
Sun, 14 Jun 2026
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